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बुधवार, 19 नवंबर 2014

संत

आध्यात्मिक बनाम मनोविज्ञान  

1. क्यों पैदा होते नकली संत ?
2. किस कारण से नकली संत की भरमार बढ़ रही भारत में  ? 
3. क्यों जाते नकली संत के पास लोग ?
4. क्या समस्या है जनता की ?
5. नेता और अभिनेता भी क्यों जाते इन नकली संत की चरण में ?

भारत में आध्यात्मिक मनोविज्ञान की दुर्दशा कांग्रेस सरकार ने की, कांग्रेस ने भारतीय जनता के मनोदशा की समस्याओं को कभी भी जानना नहीं चाहा और नहीं आधुनिकता के मनोविज्ञानी अनुसंधान पर कोई नियुक्ति केंद्र स्थापित नहीं किये !

1. क्यों पैदा होते नकली संत ?
    आधुनिकता की प्रगति में हर इन्सान जल्दबाजी से साधन सम्पन्न और ऐश्वर्य युक्त होना चाहता हैं. बिना    पूँजी लगाने लोगो के मन तक पहुचने का सबसे सरल तरीका भगवान का दर्शन बता कर दुनिया की जनता का दर्द, परेशानियाँ, व्याधिया दूर करने का सरल तरीका होने से ये नकली संत पैदा होते हैं.  

2. किस कारण से नकली संत की भरमार बढ़ रही भारत में  ? 
    सरकारी कोई नियमावली नहीं होने से कुकुरमुत्ता के समान बढती संत की सख्यां के कारण ये लोग नकली संत जल्दी उभर जाते.

3. क्यों जाते नकली संत के पास लोग ? 
    बिखरे जन समुदाय की एक मानसिक परेशानियाँ, जिसने मनोदैहिक समस्याओं के साथ पारिवारिक समस्या और सामाजिक समस्या के निराकरण एक दीखता एक रास्ता जो.

4. क्या समस्या है जनता की ?
   बीमारी एक तिल समान होती जिसको मनो जन्य ताड़ के समान दिखती का निदानात्मक किसके पास जाने का रास्ता नहीं दिखने से भगवान की चरण जाने का रास्ता गुरु बताता ये जान के नकली संत से मिलना का कारण.

5. नेता और अभिनेता भी क्यों जाते इन नकली संत की चरण में ?
  बनी बनाई भीड़ सरलता से बिना प्रयास किये बिना खर्च किये जल्दी प्रचार का माध्यम होता इस कारण से नेता और अभिनेता भी इनकी चरण में जाते.


नोट - अपनी समस्याओ को परिवार के साथ साझा करे सबसे बढिया उपाय अथवा निकतम किसी मनोविज्ञानी से परामर्शदाता से सम्पर्क करे ! अथवा मै हूँ ना, मुझ से सम्पर्क करे !

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

व्यक्ति की विकृति

संत बनाम मानसिक परेशानिया

संत शब्द भारतीय आध्यात्मक गुरु के रूप में जाना जाता हैं. संत, ज्ञानी,  महात्मा, ऋषि, धर्मात्मा, मुनि, धर्मात्मा मनुष्य, सेज, दाना, एकांतवासी, तपस्वी, संन्यासी, मुनि, सन्यासी, स्वामी. अर्थात आज का आध्यात्मक मनोविज्ञानी मेरा मानना हैं.

व्यक्ति एक सामुदायिक प्राणी हैं, व्यक्ति एक सामुदायिकता का हिस्सा हैं. समाज में जीने के लिए परिवार का विस्तार और उस विस्तार में अर्थ की आवश्यकताओं की पूर्तिकर्ता के साथ पर्यायवरण को संतुलन में कभी कभी मानसिक असंतुलन आ ही जाता हैं. जिससे व्यक्ति के कृति में विकृति का समावेश होता हैं. तब किसी संत महात्मा से सुजाव या सलाह की आवश्यकता होती हैं,

आज बदनाम संत आशाराम हो या संत रामपाल. या संत नित्यानंद या संसार में कोई अन्य संत हो. जब तक ये अपने उपदेशो से व्यक्ति के व्यक्तित्व में कोई विकार से ठीक करते, उसको ठीक होता किसी को दिखाई नहीं देता.

हकीकतों से वास्ता देखा जाए तो आप को ज्ञात होगा की इनके शिष्यों को क्या फायदा या नुकसान हुआ से ज्यादा महत्वपूर्ण ये हैं की "लोग मनोदशा से, मनो दैहिक, मनो सामाजिक या मनो पारिवारिक समस्याओ से कितने पीड़ित है".  

कुछ लोग आवेश से व्यक्ति की परेशानियों को समझे बिना अंध भक्त का नारा लगाते ! भक्त अंधे हो सकते परन्तु सभी नहीं, प्राय ठगा जाना जीवन में हर किसी से होता, फिर भी मनुष्य जीवन की अपनी समस्याओ के निवारणार्थ तो किसी से परामर्श लेना जरूरी होता और उस परामर्श से किसी विकृति में सुकृति या समस्या का समाधान होता तो सार्थक हैं.

हकीकत तो आज के युग में मानसिक परेशानिया व्यक्ति को बहुत सता रही, आज का व्यक्ति मनोदशा से परेशान बहुत हैं, जब ये परेशानिया जो दूर कर देता तो इन्सान को जब अधेरा दिखाई देता और संत प्रकाश बता देता तो उस आराम मिल जाता.

संतो की समस्या की इतना एश्वर्य मिल जाता, जिससे उस योग से भोग की और उनकी इन्द्रिया घोड़ो के वेग से गमन करती तो वो भी उस भीड़ की कृति में उनका मन भी विकृतियों में अग्रसर हो जाता जिस कारण से वो अपराध की और कब बढ़ते इस बात का पता लगता तब तक देर हो चुकी होती है.

नोट - मै किसी भी संत का प्रचारक या विरोधी नहीं हूँ.