गुरुवार, 17 मार्च 2016

रिश्ते में धोखा दे

 आखिर क्यों बहुत सी शादीशुदा महिलाएं देती हैं गैर मर्दों को एंट्री !
जयपुर।
मैरिड लाइफ में मैच्योर महिलाएं आखिर क्यों अपनी लाइफ में पसंद करती हैं गैर मर्दों का आना और करती हैं पति से चीटिंग...
1- सेक्सुअल रिलेशन में सेटिस्फाई नहीं होना इसका एक बड़ा कारण है कि महिलाएं गैर मर्दों के प्रति आकर्षित होती हैं और उनके साथ रिलेशन बनाने को गलत नहीं मानती। यही कारण है एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर बढ़ते जा रहे हैं। दरअसल इंडियन वाइफ इस बात को अपने पति से खुलकर नहीं कह पाती और दूसरा विकल्प तलाशने लगती हैं।
2- अकेलापन और लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप के कारण भी मैरिड वुमन की लाइफ में पति से भी ज्यादा महत्वपूर्ण कई पुरुष हो जाते हैं। चाहे जरूरत के चलते या फिर अकेलापन मिटाने के चलते। ऐसे में इमोश्नल रिलेशन कब फिजिकल रिलेशन में बदल जाता है, उन्हें खुद को पता नहीं चलता और यह उन्हें गिल्टी भी फील नहीं कराता।
3- आपसी अनबन के कारण भी इंडियन कपल रिश्तों में धोखा देते हैं। महिलाएं लगातार ऐसी परिस्थिति झेलते-झेलते पति से चीटिंग कर बैठती हैं और देती हैं अपनी लाइफ में गैर मर्दों को एंट्री।
4- बेमेल शादियां भी इसका बड़ा कारण है। भारत में बेमेल विवाह खूब होते हैं। जबरन बिना राय लिए माता-पिता शादी कर देते हैं, खासतौर पर लड़कियों के साथ ऐसा ज्यादा होता है। ऐसे में वकिंग प्लेस पर किसी से दोस्ती होने पर महिलाओं को लगता है कि वह ही उनका सोलमेट। ऐसे में पति को साइड करने में वे गुरेज नहीं करती।
5- उम्र का गैप होने के कारण भी कपल्स के बीच किसी तीसरे की एंट्री हो जाती है। ऐसे में पति का अफेयर भी किसी अन्य महिला से हो जाता है।
6- पैसे और शोहरत के लिए भी बहुत सी शादीशुदा महिलाएं अपने पति को धोखा देती हैं। हैरत की बात यह है कि वे इसे धोखा नहीं मानतीं। वे इसे गलत भी नहीं मानतीं।
सौजन्य से
Patrika news network Posted: 2016-03-15 16:46:53 IST

बुधवार, 19 नवंबर 2014

संत

आध्यात्मिक बनाम मनोविज्ञान  

1. क्यों पैदा होते नकली संत ?
2. किस कारण से नकली संत की भरमार बढ़ रही भारत में  ? 
3. क्यों जाते नकली संत के पास लोग ?
4. क्या समस्या है जनता की ?
5. नेता और अभिनेता भी क्यों जाते इन नकली संत की चरण में ?

भारत में आध्यात्मिक मनोविज्ञान की दुर्दशा कांग्रेस सरकार ने की, कांग्रेस ने भारतीय जनता के मनोदशा की समस्याओं को कभी भी जानना नहीं चाहा और नहीं आधुनिकता के मनोविज्ञानी अनुसंधान पर कोई नियुक्ति केंद्र स्थापित नहीं किये !

1. क्यों पैदा होते नकली संत ?
    आधुनिकता की प्रगति में हर इन्सान जल्दबाजी से साधन सम्पन्न और ऐश्वर्य युक्त होना चाहता हैं. बिना    पूँजी लगाने लोगो के मन तक पहुचने का सबसे सरल तरीका भगवान का दर्शन बता कर दुनिया की जनता का दर्द, परेशानियाँ, व्याधिया दूर करने का सरल तरीका होने से ये नकली संत पैदा होते हैं.  

2. किस कारण से नकली संत की भरमार बढ़ रही भारत में  ? 
    सरकारी कोई नियमावली नहीं होने से कुकुरमुत्ता के समान बढती संत की सख्यां के कारण ये लोग नकली संत जल्दी उभर जाते.

3. क्यों जाते नकली संत के पास लोग ? 
    बिखरे जन समुदाय की एक मानसिक परेशानियाँ, जिसने मनोदैहिक समस्याओं के साथ पारिवारिक समस्या और सामाजिक समस्या के निराकरण एक दीखता एक रास्ता जो.

4. क्या समस्या है जनता की ?
   बीमारी एक तिल समान होती जिसको मनो जन्य ताड़ के समान दिखती का निदानात्मक किसके पास जाने का रास्ता नहीं दिखने से भगवान की चरण जाने का रास्ता गुरु बताता ये जान के नकली संत से मिलना का कारण.

5. नेता और अभिनेता भी क्यों जाते इन नकली संत की चरण में ?
  बनी बनाई भीड़ सरलता से बिना प्रयास किये बिना खर्च किये जल्दी प्रचार का माध्यम होता इस कारण से नेता और अभिनेता भी इनकी चरण में जाते.


नोट - अपनी समस्याओ को परिवार के साथ साझा करे सबसे बढिया उपाय अथवा निकतम किसी मनोविज्ञानी से परामर्शदाता से सम्पर्क करे ! अथवा मै हूँ ना, मुझ से सम्पर्क करे !

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

व्यक्ति की विकृति

संत बनाम मानसिक परेशानिया

संत शब्द भारतीय आध्यात्मक गुरु के रूप में जाना जाता हैं. संत, ज्ञानी,  महात्मा, ऋषि, धर्मात्मा, मुनि, धर्मात्मा मनुष्य, सेज, दाना, एकांतवासी, तपस्वी, संन्यासी, मुनि, सन्यासी, स्वामी. अर्थात आज का आध्यात्मक मनोविज्ञानी मेरा मानना हैं.

व्यक्ति एक सामुदायिक प्राणी हैं, व्यक्ति एक सामुदायिकता का हिस्सा हैं. समाज में जीने के लिए परिवार का विस्तार और उस विस्तार में अर्थ की आवश्यकताओं की पूर्तिकर्ता के साथ पर्यायवरण को संतुलन में कभी कभी मानसिक असंतुलन आ ही जाता हैं. जिससे व्यक्ति के कृति में विकृति का समावेश होता हैं. तब किसी संत महात्मा से सुजाव या सलाह की आवश्यकता होती हैं,

आज बदनाम संत आशाराम हो या संत रामपाल. या संत नित्यानंद या संसार में कोई अन्य संत हो. जब तक ये अपने उपदेशो से व्यक्ति के व्यक्तित्व में कोई विकार से ठीक करते, उसको ठीक होता किसी को दिखाई नहीं देता.

हकीकतों से वास्ता देखा जाए तो आप को ज्ञात होगा की इनके शिष्यों को क्या फायदा या नुकसान हुआ से ज्यादा महत्वपूर्ण ये हैं की "लोग मनोदशा से, मनो दैहिक, मनो सामाजिक या मनो पारिवारिक समस्याओ से कितने पीड़ित है".  

कुछ लोग आवेश से व्यक्ति की परेशानियों को समझे बिना अंध भक्त का नारा लगाते ! भक्त अंधे हो सकते परन्तु सभी नहीं, प्राय ठगा जाना जीवन में हर किसी से होता, फिर भी मनुष्य जीवन की अपनी समस्याओ के निवारणार्थ तो किसी से परामर्श लेना जरूरी होता और उस परामर्श से किसी विकृति में सुकृति या समस्या का समाधान होता तो सार्थक हैं.

हकीकत तो आज के युग में मानसिक परेशानिया व्यक्ति को बहुत सता रही, आज का व्यक्ति मनोदशा से परेशान बहुत हैं, जब ये परेशानिया जो दूर कर देता तो इन्सान को जब अधेरा दिखाई देता और संत प्रकाश बता देता तो उस आराम मिल जाता.

संतो की समस्या की इतना एश्वर्य मिल जाता, जिससे उस योग से भोग की और उनकी इन्द्रिया घोड़ो के वेग से गमन करती तो वो भी उस भीड़ की कृति में उनका मन भी विकृतियों में अग्रसर हो जाता जिस कारण से वो अपराध की और कब बढ़ते इस बात का पता लगता तब तक देर हो चुकी होती है.

नोट - मै किसी भी संत का प्रचारक या विरोधी नहीं हूँ.        


बुधवार, 12 नवंबर 2014

"पथरी" कैसे बनती !

पथरी कैसे बनती हैं, उसकी कितनी जातियां हैं. और उनके लक्षण क्या क्या होते ? इस प्रकार का प्रश्न होना स्वभाविक होता हैं.
पथरी की व्याख्या - नये घड़े में रखें हुए स्वच्छ पानी में भी जैसे कुछ समय के बाद कीच या जमी बारीक़ रेती का पावडर दीखता उसी प्रकार से मनुष्य शरीर में बस्ती रूप में पथरी जम जाती हैं,
जब आकाश में वायु और बिजली की अग्नि बाँध कर ओले बना देती हैं. वैसे ही बस्ती स्थान पर प्राप्त हुए वायु से युक्त पित्त जमा कर पथरी बना देते हैं.
 वृक्क में जब किसी कारण से यूरिक एसिड, युटेरस, आक्जेलेट्स इत्यादि लवण अधिक मात्राओं में उत्सर्जित होते हैं. तब मुत्रस्थ जलांश में इनका विलय होना कठिन हो जाता हैं. इसलिए उनका कुछ सूक्ष्म स्फटिक के रूप में गवीनी के उर्ध्व भाग में या बस्ती में अवक्षिप्त हो जाता हैं. और उनके चारो ओर लवण के कण संगठित होकर पथरी बन जाते हैं.
 पथरी या अश्मरी को अंग्रेजी भाषा में 'कैलकुलस" कहते हैं. अश्मा [ पत्थर ] के समान कठिन होने से इस बीमारी को अश्मरी या पथरी कहते हैं.
पथरी की उत्पति में प्रकार भेद के कारण भी अनेक होते हैं. तथापि संशोधन का अभाव और आहार-विहार का विकार से ही दो प्रधान कारण सामान्यता मिलते हैं. ............................................... बाकी समय मिलने पर अपडेट   

बुधवार, 29 अक्तूबर 2014

कथनी और करनी के भेद

मनुष्य तीन प्रकार के होते हैं.
मनुष्य के चित से विचार की उत्पति शब्दों से होती हैं. शब्दों को फलित होने या नहीं होने में स्थिति असंतुलित होती हैं. इस असंतुलन में तीन प्रकार के संतुलन पाए जाते हैं.
पहला प्रकार का मनुष्य गुलाब के फुल की भाती होता है.वो हमेशा ताज़ा खिला होता हैं, अपनी खुशबू से सभी का मन मोह लेता हैं अर्थात मात्र फूलता ही फलता नहीं जैसे सिर्फ बोलता हैं, कथनी ही करता हैं. कर कुछ भी नहीं सकता.
दूसरा प्रकार का मनुष्य आम के वृक्ष के समान होता हैं. जो हमेशा फूलता हैं मद मस्त खुशबूदार मौसम पैदा करता हैं.और फलता भी हैं. मीठे रसीले आम भी देता हैं.अर्थात फूलता भी हैं और फलता भी हैं. यानि इस प्रकार के मनुष्य जो कहता भी उसको कर के भी दिखाता हैं.
तीसरा प्रकार का मनुष्य गुल्लर के समान होता हैं. जिस पर फल आता जिसको काष्ट फल भी कहते हैं. ये फूलता नहीं, सिर्फ फलता हैं. इस प्रकार का मनुष्य अपने कर्म को वाचाल नहीं करता बल्कि उस के कर्म को करके ही दिखाता हैं. 

शनिवार, 25 अक्तूबर 2014

एडमिनापन

एडमिने 
एडमिनापन एक उभरती आधुनिकता की इंटरनेट गाली. 
समय परिवर्तनशील होता हैं, पुराने जमाने में एक शब्द राजकीय [ शासकीय ] कर्मचारी के लिए सम्बोधन शब्द था, कमीण. कमीण से कमीणा शब्द क्रोध या गुस्से से पुकारा जानेवाला शब्द बना,    

 राणा महाराणाओ, राजा महाराजाओ के शासनकाल में व्यवस्थाओ के लिए नौकर रखे जाते उस समय शासकीय व्यवस्था को देख रेख के लिए उन नौकरों को कमीण बोला जाता था. उन नौकरों को उस समय मासिक वेतन नहीं मिलता था. उन कमीनो को छ्मासिक फसलो से हिस्सा दिया जाता और तीज त्यौहार पर को नया दिन माना जाता, जो एक वर्ष के बाद आता. जिसको भोजन कपड़ो से वस्तु विनमय कर के दिया जाता. उन व्यवस्थापको की जवाबदारी के मध्य जब वो भ्रष्टाचार के माध्यमो जनता को परेशान किया जाता तो उसके पीठ पीछे जनता कमीण को कमीना कह कर पुकारते.

कमीना [ कमिंणा या कमीने ] जिसको कभीकभार कोई हरामी या हरामजादा भी कह कर पुकारा जाता उसी भाती आज नये इंटरनेट के ज़माने में इंटरनेट समूहों में एडमिन या एडमिना [ एडमिनापन ] भी गाली बनता जा रहा हैं.
कैसे और क्यों यह शब्द गाली बनता जा रहा देखे.
आज हर एक **बुक पर समूह पेज बना रहा हैं. जिसकी व्यवस्था के लिए अवैतनिक एडमिन दो-चार रक्खे जा रहे, जिनके विशेष नियम नहीं होते अथवा आचार सहिता होती नहीं उस समूह की प्रकृति मान लो.
1. मेंडक के स्वभाव के सारे सदस्य हैं, और उस समूह में कोई साप किस्म का मेम्बर आ जाता तो उसका विरोध करने का कोई उपाय नहीं होता उसका विरोध पर समूह की बिना सलाह की बजाय एक का एडमिनापन भारी.
2. कुछ समूह गिदडो के स्वभाव के समान उसमे शेर स्वभाव को सदस्य आ जाता तो उस शेर को बाहर का रास्ता दिखाना में उनका विरोध पर समूह की बिना सलाह की बजाय, एक का एडमिनापन भारी.
3. कुछ समूह चन्दन की खुशबूदार में कोई गर्म तासीर का व्यक्ति भी आ जाता तो वहा से आगन्तु को शीतलता मिलती उसकी संख्या कम हैं, उनका विरोध तो समूह की बिना सलाह की बजाय, एक का एडमिनापन भारी.
4. कुछ समूह साफ-सुथरे पर शिक्षा को भेदभाव में अधिक-निम्न के असंतुलन में विरोध में उनका विरोध पर समूह की बिना सलाह की बजाय एक का एडमिनापन भारी.
5. कुछ समुह थोथे जिनके बड़े-बड़े बडबोलापन घर पर क्या समीकरण पता नहीं और दुनिया करली मुठी में वहा कोई सच बोल दे तो उनका विरोध पर समूह की बिना सलाह की बजाय, एक का एडमिनापन भारी.
6. कुछ समूह मुह में राम बगल में छुरी और उनका कोई सच्चा विरोध करे तो उस विरोध पर समूह की बिना सलाह की बजाय, एक का एडमिनापन भारी.
7. उत्तम समूहों का यहाँ कोई अनुसन्धान नहीं किया गया जिनकी संख्या बहुत कम कटु सत्य हकीकत तो समान विचारो का ही समूह होता हैं.
उस समय कोई एडमिन उस विरोधी प्रकृति वाले को बाहर निकाल देते जब की अपनी आचार सहिता पर कोई प्रबंधन नहीं होता या आपसी सहमतियों के विरोध निर्णय की पहुच से दूर करके एक एडमिन जैसे "चाय से केतली ज्यादा गर्म" का स्वभाव वाले एड्मिनापन ही कहा जाता हैं.
जो एक कमीने की तरह की गाली एड्मिने बनता जा रहा हैं.

चित्ताकर्ष्ण

 चित का आकर्षण में धनात्मक स्थान्तरण और ऋणात्मक स्थान्तरण होने की से रोग अपनी उर्जा का बर्बाद करने से नहीं रुकता. जिसका कारण दमित स्मृतियों एवं मानसिक संघर्षों में रोगी को सूझ उत्पन्न नहीं होती, जिससें उस मनुष्य में दमित स्मृतियों, चिन्तनो, डर, आशंकाओं एवं मानसिक संघर्षों का उत्पन्न होना मनोलेंगिक विकास [ psychosexual development ] में उत्पन्न समस्याओं के कारण होते है जिसमे आपसी टकराव बना रहता हैं. बल्कि दोष पूर्ण जीवनशैली तथा मन में गलत धारणाओ का विकास होता रहता हैं.  
 रोग में अपने अहं के कारण मानसिक उर्जा पर नियंत्रण नहीं रहता हैं. रोगी धीरे नियमित उपाहं [ id ]  तथा पराहं [ super ego ] की क्रियाओं पर अहं [ ego ] का नियंत्रण नहीं रहता. संघर्ष, इच्छाओ, डर आदि को अचेतन [ unconscions ] से बाहर निकलने में पर्याप्त सूझ [ insight ] विकसित करने की कोशिश नहीं करता. और निरंतरता से उलझा हुआ रहता हैं,
 इसको सरल भाषा में यू समझा जा सकता हैं.
मनुष्य के चित वर्तमान पूर्व दमित स्मृतियों, चिन्तनो, डर, आशंकाओं कारण अपने में रक्षात्मक मनोवृति से झुझता हैं. जो एक जीवनशैली बन जाता हैं,
1 धनात्मक स्थान्तरण [ positive transferensce ] विचार जैसे दिखी शराब की बोतल ही पक्ष में अपने प्रति स्नेह एवं प्रेम दीखता  हैं.
2. ऋणात्मक स्थान्तरण [ negative transferensce ] विचार जैसे दिखी शराब की बोतल में विरोध में चिल्लाना शुरू हो जाता हैं अपनी घृणा एवं संवेगों को विलग की प्रतिक्रियाओं को प्रकट करता हैं,                                       3. प्रति स्थान्तरण [ coutner transferensce ]  ये अवस्था विश्लेषणात्मक नजर से देखता हैं.                              

सामान्य पुरुष के लक्षण  
धीरज और संतोष वाले सामान्य मनुष्य को शराब की बोतल के अलावा, कुछ अन्य आकृतियों युक्त की भी मिठाई दिखती साथ मानव का चित्र भी दिखता जिसकी कोई प्रतिक्रियाओ का होना प्रकटीकरण नहीं होता. 
















       

सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

शहद

     शुद्ध शहद की पहचान.......
शुद्ध शहद में खुशबू रहती है। वह सर्दी में जम जाता है तथा गरमी में पिघल जाता है।
    शुद्ध शहद को कुत्ता नहीं खाता।
      कागज पर शहद डालने से नीचे निशान नहीं आता है।
       शहद की कुछ बूंदे पानी में डालें। यदि यह बूंदे पानी में बनी रहती है तो शहद असली है और शहद की बूंदे पानी में मिल जाती है तो शहद में मिलावट है। रूई की बत्ती बनाकर शहद में भिगोकर जलाएं यदि बत्ती जलती रहे तो शहद शुद्ध है।
        एक ज़िंदा मक्खी पकड़कर शहद में डालें। उसके ऊपर शहद डालकर मक्खी को दबा दें। शहद असली होने पर मक्खी शहद में से अपने आप ही निकल आयेगी और उड़ जायेगी। मक्खी के पंखों पर शहद नहीं चिपकता।
कपड़े पर शहद डालें और फिर पौंछे असली शहद कपडे़ पर नहीं लगता है।
      रोगों में शहद का प्रयोग .....
      कुछ बच्चे रात में सोते समय बिस्तर में ही मूत्र (पेशाब) कर देते हैं। यह एक बीमारी होती है। सोने से पहले रात में शहद का सेवन कराते रहने से बच्चों का निद्रावस्था में मूत्र (पेशाब) निकल जाने का रोग दूर हो जाता है।
      एक चम्मच शुद्ध शहद शीतल पानी में मिलाकर पीने से पेट के दर्द को आराम मिलता है।
एक चुटकी सौंठ को थोड़े से शहद में मिलाकर चाटने से काफी लाभ होता है। दो तुलसी की पत्तियां पीस लें। फिर इस चटनी को आधे चम्मच शहद के साथ सेवन करें।
       रात्री को सोते समय एक गिलास गुनगुने पानी में एक चम्मच शहद मिलाकर पी लें। इसके इस्तेमाल से सुबह पेट साफ हो जाता है।
       एक गिलास पानी में एक चम्मच नींबू का रस तथा आधा चम्मच शहद मिलाकर लेना चाहिए। इससे अजीर्ण का रोग नष्ट हो जाता है।
      शहद में दो काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर चाटना चाहिए।
अजवायन थोड़ा सा तथा सौंठ दोनों को पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को शहद के साथ चाटें।
      शहद को जरा सा गुनगुने पानी के साथ लेना चाहिए।
शहद में सौंफ, धनिया तथा जीरा का चूर्ण बनाकर मिला लें और दिन में कई बार चाटें। इससे दस्त में लाभ मिलता है।
       अनार दाना चूर्ण शहद के साथ चाटने से दस्त बंद हो जाते हैं।
       अजवायन का चूर्ण एक चुटकी को एक चम्मच शहद के साथ लेना चाहिए। दिन में तीन बार यह चूर्ण लेने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।
       सौंठ, कालीमिर्च, पीपल, सेंधानमक इन सब चीजों को मिलाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में से आधी चुटकी लेकर एक चम्मच शहद के साथ सुबह, दोपहर और शाम को इसका इस्तेमाल करें। एक दो कालीमिर्च तथा दो लौंग को पीसकर शहद के साथ चाटना चाहिए।
      धनिया तथा जीरा लेकर चूर्ण बना लें और शहद मिलाकर धीरे-धीरे चाटना चाहिए। इससे अम्लपित्त नष्ट होता है।
सौंफ, धनियां तथा अजवायन इन तीनों को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें। फिर इस चूर्ण में से आधा चम्मच चूर्ण को शहद के साथ सुबह, दोपहर और शाम को इसका सेवन करना चाहिए। इससे कब्ज दूर होती है।
रात्रि को सोते समय एक चम्मच त्रिफला-चूर्ण या एरण्ड का तेल एक गिलास दूध के साथ लेना चाहिए। इससे कब्ज दूर हो जाती है।
       त्रिफला का चूर्ण शहद के साथ सेवन करें। इससे पीलिया का रोग नष्ट हो जाता है। गिलोय का रस 12 ग्राम शहद के साथ दिन में दो बार लें। नीम के पत्तों का रस आधा चम्मच शहद के साथ सुबह-शाम सेवन करना चाहिए।
       सिर पर शुद्ध शहद का लेप करना चाहिए। कुछ ही समय में सिर का दर्द खत्म हो जायेगा। आधा चम्मच शहद और एक चम्मच देशी घी मिलाकर सिर पर लगाना चाहिए। घी तथा शहद के सूखने के बाद दोबारा लेप करना चाहिए। यदि पित्त के कारण सिर में दर्द हो तो दोनों कनपटियों पर शहद लगायें। साथ ही थोड़ा शहद भी चाटना चाहिए।
      सर्दी, गर्मी या पाचन क्रिया की खराबी के कारण सिर में दर्द हो तो नींबू के रस में शहद को मिलाकर माथे पर लेप करना चाहिए।
      कागज के टुकड़ों पर शहद और चूना को मिलाकर माथे के जिस भाग में दर्द हो उस भाग पर रख देने से सिर का दर्द दूर हो जाता है।
       भोजन के साथ शहद लेने से सिर का दर्द दूर हो जाता है।
      रतौंधी ...शहद को सलाई या अंगुली की सहायता से काजल की तरह आंखों में सुबह के समय तथा रात को सोते समय लगाना चाहिए। काजल में शहद मिलाकर बराबर लगाते रहने से भी रतौंधी की बीमारी समाप्त हो जाती है। शहद को आंखों में       काजल की तरह लगाने से रतौंधी रोग दूर होता है। आंखों की रोशनी भी बढ़ती है।
आंख में जलन के लिए शहद के साथ निबौंली (नीम का फल) का गूदा मिलाकर आंखों में काजल की तरह लगना चाहिए। शुद्ध शहद को सलाई या अंगुली की सहायता से काजल की तरह आंख में लगायें।
      आंखों के रोग के लिए एक ग्राम गुरुच का रस तथा आधा चम्मच शहद को मिला लें। फिर इसे आंखों में नियम से रोज सलाई से लगायें। आंखों की खुजली, दर्द, मोतियाबिंद तथा अन्य सभी रोगों के लिए यह उपयोगी अंजन (काजल) है।
चार ग्राम गिलोय का रस लेकर उसमें दो ग्राम शहद मिलाकर लोशन बना लें। इसे आंखों में लगायें। आंखों के सभी रोगों में इससे लाभ होगा। रोज सुबह ताजे पानी से आंखों को छप्पा (पानी की छींटे) मारकर धोना चाहिए। इसके बाद दो बूंदे नीम का रस तथा चार बूंदे शहद मिलाकर आंखों में लगाना चाहिए। कड़वे तेल से बना हुआ काजल शुद्ध शहद के साथ मिलाकर आंखों में लगाना चाहिए।
       मुंह के छाले के लिए तवे पर सुहागे को फुलाकर शहद के साथ छालों पर लगाना चाहिए। इससे मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं।
        छोटी इलायची को पीसकर बारीक चूर्ण बना लें। फिर शहद में मिलाकर छालों पर लगायें। फिटकरी को पानी में घोल लें और एक चम्मच शहद के साथ मिलाकर कुल्ला करें। यह कुल्ला भोजन करने से पहले सुबह, दोपहर तथा शाम को करना चाहिए।
      पेट में गर्मी ज्यादा हो तो त्रिफला का चूर्ण शहद के साथ लेना चाहिए। केवल आंवले का चूर्ण शहद के साथ लेने से भी पेट की गर्मी शांत होती है और मुंह के छाले ठीक होने लगते हैं।
आवाज का बैठ जाना ...फूली हुई फिटकरी पीसकर शहद के साथ मिलाकर सेवन करें। इसमें पानी मिलाकर कुल्ला किया जा सकता है। मुलहठी का चूर्ण शहद के साथ चाटना चाहिए। कुलंजन मुंह में रखकर चूसने से भी आवाज खुल जाती है।
     3 से 9 ग्राम बहेड़ा के चूर्ण को शहद के साथ सुबह और शाम सेवन करने से स्वरभंग (गला बैठना) और गले के दूसरे रोग भी ठीक हो जाते हैं।
      1 कप गर्म पानी में 1 चम्मच शहद डालकर गरारे करने से आवाज खुल जाती है।
थूक के साथ बलगम के लिए छाती पर शहद की मालिश करके गुनगुने पानी से धो लें। इससे थूक के साथ बलगम का आना बंद हो जाता है। रात्रि को सोने से पहले अजवायन का तेल छाती पर मलें। पिसी हुई हल्दी, अजवायन और सौंठ को मिलाकर एक चुटकी लेकर शहद में मिलाकर सेवन करें।
       पायरिया के लिए मसूढ़ों तथा दांतों पर शुद्ध शहद की मालिश करके गुनगुने पानी से कुल्ला करना चाहिए। नींबू का रस, नीम का तेल तथा शहद मिलाकर मसूढ़ों की मालिश करके कुल्ला कर लें। लहसुन, करेला, अदरक का रस निकालकर शहद में मिलाकर मसूढ़ों पर रोज लगाना चाहिए। तीन-चार दिन तक लगातार मालिश करने से पायरिया तथा मसूढ़ों के अन्य रोग खत्म हो जाते हैं।
      खांसी की बीमारी के लिए लाल इलायची लेकर इसे भून लें और चूर्ण बना लें, इसमें शहद मिलाकर सेवन करें। मुनक्का, खजूर, कालीमिर्च, बहेड़ा तथा पिप्पली-सभी को समान मात्रा में लेकर कूट लें और उसमें से दो चुटकी चूर्ण लेकर शहद में मिलाकर सेवन करें। 3 ग्राम सितोपलादि के चूर्ण को शहद में मिलाकर दिन में तीन बार चाटकर खाने से खांसी दूर हो जाती है।
5 ग्राम शहद में लहसुन के रस की 2-3 बूंदे मिलाकर बच्चे को चटाने से खांसी दूर हो जाती है।
         एक नींबू पानी में उबालें फिर निकालकर कांच के गिलास में निचोड़ लें। इसमें 28 मिलीलीटर ग्लिसरीन और 84 मिलीलीटर शहद मिलाकर हिलाएं। एक-एक चम्मच चार बार पीने से खांसी बंद हो जाती है। शहद खांसी में आराम देता है। 12 ग्राम शहद को दिन में तीन बार चाटने से कफ निकल जाता है और खांसी ठीक हो जाती है। थोड़ी सी फिटकरी को तवे पर भून लेते हैं। इस 1 चुटकी फिटकरी को शहद के साथ दिन में 3 बार चाटने से खांसी में लाभ मिलता है।
काली खांसी के लिए सबसे पहले रोगी की कब्ज को दूर करना चाहिए। इसके लिए एरण्ड का तेल पिलाया जा सकता है। इसके बाद चिकित्सा आरम्भ शुरू करनी चाहिए। चिकित्सा के लिए शहद में लौंग के तेल की एक बूंद तथा अदरक के रस की दस बूंदे मिलाकर सुबह, दोपहर और शाम को देनी चाहिए।
       दमा के लिए शहद में कुठार रस 4 बूंद मिलाकर दिन में 3-4 बार देना चाहिए। इससे दमा का रोग नष्ट हो जाता है।
सोमलता, कूट, बहेड़ा, मुलेठी, अडूसा के पत्ते, अर्जुन की छाल तथा काकड़ासिंगी सबका एक समान मात्रा में लेकर पीस लें। इसमें से एक चम्मच चूर्ण शहद के साथ सेवन करें। प्यास लगने पर गर्म पानी पीयें।
         पसलियों में दर्द के लिए सांभर सींग को पानी में घिसकर शहद के साथ मिलाकर पसलियों पर लेप करना चाहिए।
         एक कप दूध में एक चम्मच शहद मिलाकर सुबह के समय पीने से ताकत बढ़ती है।
        जुकाम के लिए शहद और अदरक का रस एक-एक चम्मच मिलाकर सुबह-शाम दिन में दो बार पीने से जुकाम खत्म हो जाता है और भूख बढ़ जाती है।
           2 चम्मच शहद, 200 मिलीलीटर गुनगुना दूध और आधे चम्मच मीठे सोडे को एक साथ मिलाकर सुबह और शाम पीने से जुकाम, फ्लू ठीक हो जाता है। इसको पीने से बहुत पसीना आता है पर पसीना आने पर रोगी को हवा नहीं लगने देना चाहिए।
          20 ग्राम शहद, आधा ग्राम सेंधानमक और आधा ग्राम हल्दी को 80 मिलीलीटर पानी में डालकर उबाल कर रख लें। कुछ देर बाद जब पानी हल्का सा गर्म रह जाये तो इस पानी को सोते समय पीने से जुकाम दूर हो जाता है।
बिच्छू के डंक मारे हुए स्थान पर शहद लगाने से दर्द कम हो जाता है।
        जलन के लिए नियमित सुबह 20 ग्राम शहद ठंडे पानी में मिलाकर सेवन करने से जलन, खुजली और फुन्सियों जैसी चर्म रोग जड़मूल से समाप्त हो जाती है।
   शरीर के जले हुए अंगो पर शहद लगाने से जलन दूर होती है। जख्म होने पर शहद को तब तक लगाते रहे जब तक कि जख्म ठीक ना हो जायें। जख्म ठीक होने के बाद सफेद निशान बन जाते हैं। उन पर शहद लगाकर पट्टी बांधते रहने से निशान मिट जाते हैं।
       शीघ्रपतन के लिए स्त्री-संग सम्भोग से एक घण्टा पहले पुरुष की नाभि में शहद में भिगोया हुआ रूई का फोहा रखने से पुरुष का जल्दी स्खलन नही होता अर्थात पुरुष का लिंग शिथिल नहीं होता है।
       बलगम युक्त खांसी के लिए 5 ग्राम शहद दिन में चार बार चाटने से बलगम निकल कर खांसी दूर होती है। शहद और अडूसा के पत्तों का रस एक-एक चम्मच तथा अदरक का रस आधा चम्मच मिलाकर पीने से खांसी नष्ट हो जाती है।
     उल्टी के लिए गुड़ को शहद में मिलाकर सेवन करने से उल्टी बंद हो जाती है। उल्टी होने पर शहद को चाटने से उल्टी होना बंद हो जाती है। शहद में लौंग का चूर्ण मिलाकर चाटने से गर्भावस्था में उल्टी आने से छुटकारा मिलता है।
     रक्तविकार के लिए बकरी के दूध में आठवां हिस्सा शहद मिलाकर पीने से खून साफ हो जाता है। इसका प्रयोग करते समय नमक और मिर्च का त्याग कर देना आवश्यक है।
     यक्ष्मा या टी.बी. के लिए ताजा मक्खन के साथ शहद का सेवन करने से क्षय रोग में लाभ होता है। शहद में करेले का चूर्ण डालकर चाटना चाहिए।
    हाईब्लडप्रेशर के लिए दो चम्मच शहद और नींबू का रस एक चम्मच मिलाकर सुबह-शाम दिन में दो से तीन बार सेवन करने से हाई बल्डप्रेशर में लाभ होता है।
     कान दर्द के लिए कान में शहद डालने से कान की पीव और कान का दर्द नष्ट हो जाता है। कान में कनखजूरा सदृश जीव-जंतु घुस गया हो तो शहद और तेल मिलाकर उसकी कुछ बूंदे कान में डालने से लाभ होता है।
     आंख आना के लिए 1 ग्राम पिसे हुए नमक को शहद में मिलाकर आंखों में सुबह और शाम लगाऐं। सोनामक्खी को पीसकर और शहद में मिलाकर आंखों में सुबह और सांय लगाए। चन्द्रोदय वर्ति (बत्ती) को पीसकर शहद के साथ आंखों में लगाने से आंखों के रोग दूर होते हैं।
     मलेरिया का बुखार के लिए शुद्ध शहद 20 ग्राम, सैंधानमक आधा ग्राम, हल्दी आधा ग्राम को पीसकर 80 ग्राम की मात्रा में गर्म पानी में डालकर रात को पीने से मलेरिया का बुखार और जुकाम ठीक हो जाता है।
     फेफड़ों के रोगों में शहद लाभदायक रहता है। श्वास में और फेफड़ों के रोगों में शहद अधिक प्रयोग करते हैं।
    दांतों का दर्द के लिए 1 चम्मच शहद में, लहसुन का रस 20 बूंद मिलाकर प्रतिदिन सुबह-शाम चाटें। इससे पायरिया, मसूढ़ों की सूजन, दर्द, मुंह की दुर्गन्ध आदि खत्म होती है। मसूढ़ों में सूजन व खून निकलने के कारण दांत हिलने लगते हैं। शहद अथवा सरसों के तेल से कुल्ला करने से मसूढ़ों का रोग नष्ट हो जाता है।
      इन्फ्लुएन्जा के लिए शहद में पीपल का 1 चुटकी चूर्ण मिलाकर चाटने से आराम मिलता है।2 चम्मच शहद, 200 मिलीलीटर गर्म दूध, आधा चम्मच मीठा सोड़ा मिलाकर सुबह और शाम को पिलाने से इन्फ्लुएन्जा पसीना आकर ठीक हो जाता है।
       बच्चों के दांत निकलते समय मसूढ़ों पर शहद मलने से दांत निकलते समय दर्द में आराम रहता है।
निमोनिया रोग में रोगी के शरीर की पाचन-क्रिया प्रभावित होती है इसलिए सीने तथा पसलियों पर शुद्ध शहद की मालिश करें और थोड़ा सा शहद गुनगुने पानी में डालकर रोगी को पिलाने से इस रोग में लाभ होता है।
   जीभ की प्रदाह और सूजन के लिए जीभ के रोग में शहद को घोलकर मुंह में भरकर रखने से जीभ के रोग में लाभ होता है।
    गर्भनिरोध के लिए चूहे की मींगनी शहद में मिलाकर योनि में रखने से गर्भ नहीं ठहरता है। शहद 250 ग्राम को हाथी की लीद (गोबर) का रस 250 मिलीलीटर की मात्रा में शहद के साथ ऋतु (माहवारी) होने के बाद स्त्रियों को सेवन कराने से गर्भधारण नहीं होता है।
    लाख के पानी में शहद मिलाकर पीने से खून की उल्टी होना रुक जाती है।
      मुंह के छाले के लिए नीलाथोथा लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग को भुन पीसकर 10 ग्राम शहद में मिलालें। इस मिश्रण को रूई से छालों पर लगायें तथा लार बाहर निकलने दें। मुंह की गंदगी लार के रूप में मुंह से बाहर निकाल कर छालों को ठीक करती है।
     गर्भावस्था में महिलाओं के शरीर में रक्त की कमी आ जाती है। गर्भावस्था के समय रक्त बढ़ाने वाली चीजों का अधिक सेवन करना चाहिए। महिलाओं को दो चम्मच शहद प्रतिदिन सेवन करने से रक्त की कमी नहीं होती है। इससे शारीरिक शक्ति बढ़ती है और बच्चा मोटा और ताजा होता है। गर्भवती महिला को गर्भधारण के शुरू से ही या अंतिम तीन महीनों में दूध और शहद पिलाने से बच्चा स्वस्थ और मोटा ताजा होता है।
      शहद में उंगली डूबोकर दिन में 3 बार चाटने से हिचकी से आराम मिलता है। शहद और काला नमक में नींबू का रस मिलाकर सेवन करने से हिचकी से आराम मिलता है। प्याज के रस में शहद मिलाकर चाटने से हिचकी बंद हो जाती है।
      कान का दर्द के लिए लगभग 3 ग्राम शहद, 6 मिलीलीटर अदरक का रस, 3 मिलीलीटर तिल का तेल और लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग सेंधानमक को एक साथ मिलाकर इसकी थोड़ी सी बूंदे कान में डालकर उसके ऊपर से रूई लगा देने से कान से कम सुनाई देना, कान का दर्द, कान में अजीब-अजीब सी आवाजे सुनाई देना आदि रोग दूर हो जाते हैं। 5 मिलीलीटर सूरजमुखी के फूलों का रस, 5 ग्राम शहद, 5 मिलीलीटर तिल का तेल और 3 ग्राम नमक को मिलाकर कान में बूंद-बूंद करके कान में डालने से कान का दर्द ठीक हो जाता है।
      शहद में समुद्रफेन को घिसकर कान में डालने से बहरेपन का रोग ठीक हो जाता है।
      शहद और दूध मिलाकर पीने से धातु (वीर्य) की कमी दूर होती है। और शरीर बलवान होता है।
      शहद और नीम की गोंद को बराबर मात्रा में एक साथ मिलाकर कान में 2-2 बूंद डालने से कान मे से मवाद का बहना बंद हो जाता है।
     शहद की 3-4 बूंदे कान में डालने से कान का दर्द पूरी तरह से ठीक हो जाता है। कान को अच्छी तरह से साफ करके उसमे रसौत, शहद और और औरत के दूध को एक साथ मिलाकर 2-3 बूंदे रोजाना 3 बार कान में डालने से कान में से मवाद का बहना बंद हो जाता है।
     कान में कुछ पड़ जाना ...रूई की एक बत्ती बनाकर शहद में भिगो लें और कान में धीरे-धीरे से घुमायें। ऐसा करने से कान में जितने भी छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़े होगें वो बत्ती के साथ चिपककर बाहर आ जायेंगे।
    पुराने से पुराने घाव में हरीतकी को पानी में पीसकर शहद के साथ मिलाकर लेप करने से घाव शीघ्र ही ठीक हो जाता है। शहद लगाने से घाव जल्द भरते है।
     कौआ गिरना ....4 से 6 ग्राम शहद को कालक का चूर्ण 1 से 3 ग्राम मिलाकर दिन में 2 बार लेने से रोग में लाभ होता है।
     पक्षाघात-लकवा-फालिस फेसियल, परालिसिस लगभग 20 से 25 दिन तक रोजाना लगभग 150 ग्राम शहद शुद्ध पानी में मिलाकर रोगी को देने से शरीर का लकवा ठीक हो जाता है। लगभग 28 मिलीलीटर पानी को उबालें और इस पानी के ठंडा होने पर उसमें दो चम्मच शहद डालकर पीड़ित व्यक्ति को पिलाने से कैल्शियम की मात्रा शरीर में उचित रूप में आ जाती है जोकि लकवे से पीड़ित भाग को ठीक करने में मददगार होती है।
शहद में एक चुटकी अफीम मिलाकर और उसमें घिसकर चाटने से पेचिश के रोगी का रोग दूर हो जाता है।
शहद और सेंधानमक को मिलाकर बत्ती बनायें। बत्ती को नासूर में रखने से भगन्दर रोग में आराम मिलता है।
    मोच के स्थान पर शहद और चूना मिलाकर हल्की मालिश करने से आराम होता है।
    स्त्री को गुनगुने गर्म पानी के टब में बैठायें तथा शहद में भिगोये हुए कपडे़ को योनि में रखे। इससे सर्दी का असर दूर हो जाता है और प्रसव हो जाता है।
    शहद को मुंह में भरकर कुछ देर तक रखकर कुल्ला करें। इससे तेज प्यास शांत हो जाती है। पानी में शहद या चीनी मिलाकर पीने से गले की जलन व प्यास मिट जाती है। 20 ग्राम शहद को मुंह में 10 मिनट तक रखें फिर कुल्ला कर दें। इससे अधिक तेज प्यास भी शांत हो जाती है।
     20 ग्राम शहद में 40 मिलीलीटर पानी डालकर उबालकर रख लें, फिर इस पानी को पिलाने से जलोदर की बीमारी में लाभ होता है। शहद और पीपल का चूर्ण छाछ में मिलाकर पीने से लाभ होगा।
मासिक स्राव के लिए शहद के साथ कबूतर की बीट मिलाकर खाने से रजोदर्शन (माहवारी) होता है और बांझपन दूर हो जाता है।
     शीतपित्त के लिए केसर 6 ग्राम, शहद 25 ग्राम रोगी को सुबह-शाम खिलाने से शीतपित्त में लाभ मिलता है। एक चम्मच शहद और एक चम्मच त्रिफला मिलाकर सुबह-शाम खाने से भी लाभ होता है।
     मोटापा (स्थूलता) दूर करने के लिए 120 ग्राम से लेकर 240 ग्राम शहद को 100 से 200 मिलीलीटर गुनगुने पानी में मिलाकर दिन में 3 बार खुराक के रूप में सेवन करें।
      गिल्टी (ट्यूमर) के लिए चूना और शहद को अच्छी तरह से मिलाकर गिल्टी पर लगाने से रोग में आराम मिलता है।
शहद का रोज दूध में मिलाकर सेवन करने से मोटापा बढ़ता हैं।
      शहद के साथ लगभग 1-2 ग्राम पोस्ता पीसकर इसको शहद में घोलकर रोजाना सोने से पहले रोगी को देने से अच्छी नींद आती है। इससे रोगी को आराम से नींद आ जाती है। शहद के साथ लगभग 3-9 ग्राम बहेड़ा के चूर्ण को रोगी को सुबह और शाम को सेवन करने से लाभ प्राप्त होता है।
     नींद ना आना (अनिद्रा) के लिए एक-एक चम्मच नींबू का रस और शहद को मिलाकर रात को सोने से पहले दो चम्मच पीने से नींद आ जाती है। जब नींद खुले तब दो चम्मच पुन: लेने पर नींद आ जाती है और यदि केवल पानी के गिलास में शहद की दो चम्मच डालकर पीने से नींद आ जाती है। शहद या शर्करा के शर्बत में पोस्तादाना को पीसकर इसको घोलकर सेवन करने से नींद अच्छी आती है।
      पेट के कीड़े के लिए दो चम्मच शहद को 250 मिलीलीटर पानी में डालकर दिन में दो बार सुबह और शाम पीने से लाभ होता है। थोड़ी मात्रा में सेवन करने से भी पेट के कीड़े समाप्त हो जाते हैं।
     आधासीसी (माइग्रेन) के लिए इस रोग में सूर्य उगने के साथ दर्द का बढ़ना और ढलने के साथ सिर दर्द का कम होना होता है, तो जिस ओर सिर में दर्द हो रहा हो उसके दूसरी ओर के नाक के नथुने में एक बूंद शहद डालने से सिर के दर्द में आराम मिलता है। रोजाना भोजन के समय दो चम्मच शहद लेते रहने से आधे सिर में दर्द व उससे होने वाली उल्टी आदि बंद हो जाती हैं।
     नाक के रोग के लिए शहद या गुड़ के साथ गूलर के पके हुए फल को खाने से नाक से खून आना बंद हो जाता है।
शहद के साथ लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से लगभग 1 ग्राम सुहागे की खील (लावा) को चटाने से आक्षेप और मिर्गी में बहुत आराम आता है। शहद के साथ लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग जटामांसी का चूर्ण सुबह और शाम रोगी को देने से आक्षेप के दौरे ठीक हो जाते हैं।
    पेट में दर्द के लिए शहद का प्रयोग करने से खाना खाने के बाद होने वाले पेट दर्द समाप्त होते है। शहद और पानी मिलाकर पीने से पेट के दर्द में राहत मिलती है।
    तंग योनि को शिथिल करना ..10 ग्राम शहद को 5 ग्राम देशी घी में मिलाकर योनि पर लगाने से तंग योनि शिथिल होती है।
     शहद के साथ लगभग तीन ग्राम कलौंजी का सुबह के समय सेवन करने से भूलने की बीमारी दूर हो जाती है।
     शहद के साथ लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग चांदी की भस्म सुबह और शाम को लेने से बुद्धि के विकास में वृद्धि होती है।
     शहद और पीपल का पीसा हुआ चूर्ण छाछ के साथ पीने से छाती के दर्द में लाभ मिलता है।
      चिड़चिडापन और मन की उदासी के लिए शहद के साथ गुल्म कुठार की लगभग 1 या 2 गोलियां सुबह और शाम को देने से चिड़चिड़ा स्वभाव और मन की उदासी दूर हो जाती है।
     शहद में लगभग 3 ग्राम कलौंजी का चूर्ण मिलाकर चाटने से याददास्त तेज हो जाती है। लगभग 30 ग्राम शहद के साथ 20 ग्राम घी मिलाकर भोजन के बाद रोजाना लेने से दिमाग की याददास्त तेज होती है।
सावधानियां :
    शहद को अग्नि (आग) पर कभी गरम नही करना चाहिए और न ही अधिक गर्म चीजें शहद में मिलानी चाहिए इससे शहद के गुण समाप्त हो जाते हैं। इसको हल्के गरम दूध या पानी में ही मिला कर सेवन करना चाहिए। तेल, घी, चिकने पदार्थ के साथ सममात्रा (समान मात्रा) में शहद मिलाने से जहर बन जाता है।
यदि शहद से कोई हानि हो तो नींबू का सेवन करें। ऐसी स्थिति में नीबू का सेवन करना रोगों को दूर कर लाभ पहुंचाता है