बुधवार, 5 सितंबर 2018

आयुर्वेद के अनुसार मानस रोग


रजस्तमश्च् मानसौ दोषौ-तयोवकारा काम, क्रोध, लोभ, माहेष्यार्मानमद शोक चित्तोस्तो द्वेगभय हषार्दयः ।
रज और तम ये दो मानस रोग हैं । इनकी विकृति से होने वाले विकार मानस रोग कहलाते हैं ।

मानस रोग-
काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईष्यार्, मान, मद, शोक, चिन्ता, उद्वेग, भय, हषर्, विषाद, अभ्यसूया, दैन्य, मात्सयर् और दम्भ ये मानस रोग हैं ।

१. काम- इन्द्रियों के विषय में अधिक आसक्ति रखना 'काम' कहलाता है ।

२. क्रोध- दूसरे के अहित की प्रवृत्ति जिसके द्वारा मन और शरीर भी पीड़ित हो उसे क्रोध कहते हैं ।

३. लोभ- दूसरे के धन, स्त्री आदि के ग्रहण की अभिलाषा को लोभ कहते हैं ।

४. ईर्ष्या- दूसरे की सम्पत्ति-समृद्धि को सहन न कर सकने को ईर्ष्या कहते हैं ।

५. अभ्यसूया- छिद्रान्वेषण के स्वभाव के कारण दूसरे के गुणों को भी दोष बताना अभ्यसूया या असूया कहते हैं ।

६. मात्सर्य- दूसरे के गुणों को प्रकट न करना अथवा कू्ररता दिखाना 'मात्सर्य' कहलाता है ।

७. मोह- अज्ञान या मिथ्या ज्ञान (विपरीत ज्ञान) को मोह कहते हैं ।

८. मान- अपने गुणों को अधिक मानना और दूसरे के गुणों का हीन दृष्टि से देखना 'मान' कहलाता है ।

९. मद- मान की बढ़ी हुई अवस्था 'मद' कहलाती है ।

१०. दम्भ- जो गुण, कमर् और स्वभाव अपने में विद्यमान न हों, उन्हें उजागर कर दूसरों को ठगना 'दम्भ' कहलाता है ।

११. शोक- पुत्र आदि इष्ट वस्तुओं के वियोग होने से चित्त में जो उद्वेग होता है, उसे शोक कहते हैं ।

१२. चिंता- किसी वस्तु का अत्यधिक ध्यान करना 'चिन्ता' कहलाता है ।

१३. उद्वेग- समय पर उचित उपाय न सूझने से जो घबराहट होती है उसे 'उद्वेग' कहते हैं ।

१४. भय- अन्य आपत्ति जनक वस्तुओं से डरना 'भय' कहलाता है ।

१५. हर्ष- प्रसन्नता या बिना किसी कारण के अन्य व्यक्ति की हानि किए बिना अथवा सत्कर्म करके मन में प्रसन्नता का अनुभव करना हषर् कहलाता है ।

१६. विषाद- कार्य में सफलता न मिलने के भय से कार्य के प्रति साद या अवसाद-अप्रवृत्ति की भावना 'विषाद' कहलाता है ।

१७. दैन्य- मन का दब जाना- अथार्त् साहस और धैर्य खो बैठना दैन्य कहलाता है ।

ये सब मानस रोग 'इच्छा' और 'द्वेष' के भेद से दो भागों में विभक्त किये जा सकते हैं । किसी वस्तु (अथर्) के प्रति अत्यधिक अभिलाषा का नाम 'इच्छा' या 'राग' है । यह नाना वस्तुओं और न्यूनाधिकता के आधार पर भिन्न-भिन्न होती है ।

हर्ष, शोक, दैन्य, काम, लोभ आदि इच्छा के ही दो भेद हैं । अनिच्छित वस्तु के प्रति अप्रीति या अरुचि को द्वेष कहते हैं । वह नाना वस्तुओं पर आश्रित और नाना प्रकार का होता है । क्रोध, भय, विषाद, ईर्ष्या, असूया, मात्सर्य आदि द्वेष के ही भेद हैं ।

मंगलवार, 3 जुलाई 2018

my health care: जीवनशैली

my health care: जीवनशैली: आधुनिक जीवनशैली बच्चे बड़े सभी में परिवर्तन आ चूका है, इंटरनेट जैसा शब्द किसी के लिए फ़ायदेमंद, किसी के लिए लाभदायक, तो किसी के लिए नुकसानदा...

जीवनशैली

आधुनिक जीवनशैली बच्चे बड़े सभी में परिवर्तन आ चूका है, इंटरनेट जैसा शब्द किसी के लिए फ़ायदेमंद, किसी के लिए लाभदायक, तो किसी के लिए नुकसानदायक.

उर्जावान आर्थिक सम्पन्न व्यापारी गण सर्वाधिक फायदा ले रहे है, अपना व्यापार को नई ऊचाई दे के और सुदृढ़ हो रहे है, एक स्थान पर बैठे बैठे आसानी से अपने व्यापार का संचालन करे रहे है,

सरकारी संस्थाएँ, गैर सरकारी संस्थाएँ भी कदम से कदम मिलाते चल रहे है, विधार्थी जीवन भी इस से सफल बना रहे है,

अपराधी भी अपना अपराध बढ़ाने में पीछे नहीं है.

परन्तु सर्वाधिक नुकसानदायक उन युवाओं का हो रहा है, जो अपनी संस्कृति को भुला कर, अपने परिवार की आज्ञा नही मानकर एक नशे के रूप में इंटरनेट का उपयोग का दुरुपयोग कर रहे है. अपनी जवाबदारी को भूल कर एक बाध्यकारी आदत से मजबूर हो कर हर दम इंटरनेट के फेसबुक, यूट्यूब, वेबसाइट और वाट्स एप से चिपके रहते है, ये इस प्रकार से जो लोग अपनी पिता, पत्नी, पति या भाई-बहनों की कमाई से अपने जीवन को बर्बाद ही कर रहे है,

आज कल बच्चो को भी इस स्मार्ट फोन से मानसिक विकास में बाधा उत्पन्न होने में अभीभावक का सयोग होना पाया गया है, बच्चो की अनावश्यक मांग को मना नहीं कर पाने के कारण  से बच्चो को स्मार्ट फोन की आवश्यकता नहीं होने के बाद भी माता-पिता फोन उपलब्ध करा देते है, जब माता पिता बच्चे की ज़िद छुड़ाने के कारण स्मार्ट फोन दे देते जिसमे माता का सहयोग अधिक पाया जाता है, बच्चा अपने पास के वातावरण से प्रभावित ये भूल जाता की मुझे भविष्य में अपना जीवन सुधारना है, धीरे धीरे बच्चा इतना आदि हो चूका होता है की एक नशे के रूप में बाध्यकारी जीवन जीता जो अब दिन क्या, रात्रि क्या, हमेशा आन लाइन ही रहता हैं,

अपने बच्चे को समझाये की उसके लिए कितना नफा-नुकसान होता है, अपने बच्चे को रोकिये, नहीं माने तो टोकिये, स्कूल में जिस तरह पढ़ाई का टाइम टेबल होता वैसे ही इंटरनेट का एक टाइम टेबल निर्धारण कीजिये, 

गुरुवार, 17 मार्च 2016

रिश्ते में धोखा दे

 आखिर क्यों बहुत सी शादीशुदा महिलाएं देती हैं गैर मर्दों को एंट्री !
जयपुर।
मैरिड लाइफ में मैच्योर महिलाएं आखिर क्यों अपनी लाइफ में पसंद करती हैं गैर मर्दों का आना और करती हैं पति से चीटिंग...
1- सेक्सुअल रिलेशन में सेटिस्फाई नहीं होना इसका एक बड़ा कारण है कि महिलाएं गैर मर्दों के प्रति आकर्षित होती हैं और उनके साथ रिलेशन बनाने को गलत नहीं मानती। यही कारण है एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर बढ़ते जा रहे हैं। दरअसल इंडियन वाइफ इस बात को अपने पति से खुलकर नहीं कह पाती और दूसरा विकल्प तलाशने लगती हैं।
2- अकेलापन और लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप के कारण भी मैरिड वुमन की लाइफ में पति से भी ज्यादा महत्वपूर्ण कई पुरुष हो जाते हैं। चाहे जरूरत के चलते या फिर अकेलापन मिटाने के चलते। ऐसे में इमोश्नल रिलेशन कब फिजिकल रिलेशन में बदल जाता है, उन्हें खुद को पता नहीं चलता और यह उन्हें गिल्टी भी फील नहीं कराता।
3- आपसी अनबन के कारण भी इंडियन कपल रिश्तों में धोखा देते हैं। महिलाएं लगातार ऐसी परिस्थिति झेलते-झेलते पति से चीटिंग कर बैठती हैं और देती हैं अपनी लाइफ में गैर मर्दों को एंट्री।
4- बेमेल शादियां भी इसका बड़ा कारण है। भारत में बेमेल विवाह खूब होते हैं। जबरन बिना राय लिए माता-पिता शादी कर देते हैं, खासतौर पर लड़कियों के साथ ऐसा ज्यादा होता है। ऐसे में वकिंग प्लेस पर किसी से दोस्ती होने पर महिलाओं को लगता है कि वह ही उनका सोलमेट। ऐसे में पति को साइड करने में वे गुरेज नहीं करती।
5- उम्र का गैप होने के कारण भी कपल्स के बीच किसी तीसरे की एंट्री हो जाती है। ऐसे में पति का अफेयर भी किसी अन्य महिला से हो जाता है।
6- पैसे और शोहरत के लिए भी बहुत सी शादीशुदा महिलाएं अपने पति को धोखा देती हैं। हैरत की बात यह है कि वे इसे धोखा नहीं मानतीं। वे इसे गलत भी नहीं मानतीं।
सौजन्य से
Patrika news network Posted: 2016-03-15 16:46:53 IST

बुधवार, 19 नवंबर 2014

संत

आध्यात्मिक बनाम मनोविज्ञान  

1. क्यों पैदा होते नकली संत ?
2. किस कारण से नकली संत की भरमार बढ़ रही भारत में  ? 
3. क्यों जाते नकली संत के पास लोग ?
4. क्या समस्या है जनता की ?
5. नेता और अभिनेता भी क्यों जाते इन नकली संत की चरण में ?

भारत में आध्यात्मिक मनोविज्ञान की दुर्दशा कांग्रेस सरकार ने की, कांग्रेस ने भारतीय जनता के मनोदशा की समस्याओं को कभी भी जानना नहीं चाहा और नहीं आधुनिकता के मनोविज्ञानी अनुसंधान पर कोई नियुक्ति केंद्र स्थापित नहीं किये !

1. क्यों पैदा होते नकली संत ?
    आधुनिकता की प्रगति में हर इन्सान जल्दबाजी से साधन सम्पन्न और ऐश्वर्य युक्त होना चाहता हैं. बिना    पूँजी लगाने लोगो के मन तक पहुचने का सबसे सरल तरीका भगवान का दर्शन बता कर दुनिया की जनता का दर्द, परेशानियाँ, व्याधिया दूर करने का सरल तरीका होने से ये नकली संत पैदा होते हैं.  

2. किस कारण से नकली संत की भरमार बढ़ रही भारत में  ? 
    सरकारी कोई नियमावली नहीं होने से कुकुरमुत्ता के समान बढती संत की सख्यां के कारण ये लोग नकली संत जल्दी उभर जाते.

3. क्यों जाते नकली संत के पास लोग ? 
    बिखरे जन समुदाय की एक मानसिक परेशानियाँ, जिसने मनोदैहिक समस्याओं के साथ पारिवारिक समस्या और सामाजिक समस्या के निराकरण एक दीखता एक रास्ता जो.

4. क्या समस्या है जनता की ?
   बीमारी एक तिल समान होती जिसको मनो जन्य ताड़ के समान दिखती का निदानात्मक किसके पास जाने का रास्ता नहीं दिखने से भगवान की चरण जाने का रास्ता गुरु बताता ये जान के नकली संत से मिलना का कारण.

5. नेता और अभिनेता भी क्यों जाते इन नकली संत की चरण में ?
  बनी बनाई भीड़ सरलता से बिना प्रयास किये बिना खर्च किये जल्दी प्रचार का माध्यम होता इस कारण से नेता और अभिनेता भी इनकी चरण में जाते.


नोट - अपनी समस्याओ को परिवार के साथ साझा करे सबसे बढिया उपाय अथवा निकतम किसी मनोविज्ञानी से परामर्शदाता से सम्पर्क करे ! अथवा मै हूँ ना, मुझ से सम्पर्क करे !

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

व्यक्ति की विकृति

संत बनाम मानसिक परेशानिया

संत शब्द भारतीय आध्यात्मक गुरु के रूप में जाना जाता हैं. संत, ज्ञानी,  महात्मा, ऋषि, धर्मात्मा, मुनि, धर्मात्मा मनुष्य, सेज, दाना, एकांतवासी, तपस्वी, संन्यासी, मुनि, सन्यासी, स्वामी. अर्थात आज का आध्यात्मक मनोविज्ञानी मेरा मानना हैं.

व्यक्ति एक सामुदायिक प्राणी हैं, व्यक्ति एक सामुदायिकता का हिस्सा हैं. समाज में जीने के लिए परिवार का विस्तार और उस विस्तार में अर्थ की आवश्यकताओं की पूर्तिकर्ता के साथ पर्यायवरण को संतुलन में कभी कभी मानसिक असंतुलन आ ही जाता हैं. जिससे व्यक्ति के कृति में विकृति का समावेश होता हैं. तब किसी संत महात्मा से सुजाव या सलाह की आवश्यकता होती हैं,

आज बदनाम संत आशाराम हो या संत रामपाल. या संत नित्यानंद या संसार में कोई अन्य संत हो. जब तक ये अपने उपदेशो से व्यक्ति के व्यक्तित्व में कोई विकार से ठीक करते, उसको ठीक होता किसी को दिखाई नहीं देता.

हकीकतों से वास्ता देखा जाए तो आप को ज्ञात होगा की इनके शिष्यों को क्या फायदा या नुकसान हुआ से ज्यादा महत्वपूर्ण ये हैं की "लोग मनोदशा से, मनो दैहिक, मनो सामाजिक या मनो पारिवारिक समस्याओ से कितने पीड़ित है".  

कुछ लोग आवेश से व्यक्ति की परेशानियों को समझे बिना अंध भक्त का नारा लगाते ! भक्त अंधे हो सकते परन्तु सभी नहीं, प्राय ठगा जाना जीवन में हर किसी से होता, फिर भी मनुष्य जीवन की अपनी समस्याओ के निवारणार्थ तो किसी से परामर्श लेना जरूरी होता और उस परामर्श से किसी विकृति में सुकृति या समस्या का समाधान होता तो सार्थक हैं.

हकीकत तो आज के युग में मानसिक परेशानिया व्यक्ति को बहुत सता रही, आज का व्यक्ति मनोदशा से परेशान बहुत हैं, जब ये परेशानिया जो दूर कर देता तो इन्सान को जब अधेरा दिखाई देता और संत प्रकाश बता देता तो उस आराम मिल जाता.

संतो की समस्या की इतना एश्वर्य मिल जाता, जिससे उस योग से भोग की और उनकी इन्द्रिया घोड़ो के वेग से गमन करती तो वो भी उस भीड़ की कृति में उनका मन भी विकृतियों में अग्रसर हो जाता जिस कारण से वो अपराध की और कब बढ़ते इस बात का पता लगता तब तक देर हो चुकी होती है.

नोट - मै किसी भी संत का प्रचारक या विरोधी नहीं हूँ.        


बुधवार, 12 नवंबर 2014

"पथरी" कैसे बनती !

पथरी कैसे बनती हैं, उसकी कितनी जातियां हैं. और उनके लक्षण क्या क्या होते ? इस प्रकार का प्रश्न होना स्वभाविक होता हैं.
पथरी की व्याख्या - नये घड़े में रखें हुए स्वच्छ पानी में भी जैसे कुछ समय के बाद कीच या जमी बारीक़ रेती का पावडर दीखता उसी प्रकार से मनुष्य शरीर में बस्ती रूप में पथरी जम जाती हैं,
जब आकाश में वायु और बिजली की अग्नि बाँध कर ओले बना देती हैं. वैसे ही बस्ती स्थान पर प्राप्त हुए वायु से युक्त पित्त जमा कर पथरी बना देते हैं.
 वृक्क में जब किसी कारण से यूरिक एसिड, युटेरस, आक्जेलेट्स इत्यादि लवण अधिक मात्राओं में उत्सर्जित होते हैं. तब मुत्रस्थ जलांश में इनका विलय होना कठिन हो जाता हैं. इसलिए उनका कुछ सूक्ष्म स्फटिक के रूप में गवीनी के उर्ध्व भाग में या बस्ती में अवक्षिप्त हो जाता हैं. और उनके चारो ओर लवण के कण संगठित होकर पथरी बन जाते हैं.
 पथरी या अश्मरी को अंग्रेजी भाषा में 'कैलकुलस" कहते हैं. अश्मा [ पत्थर ] के समान कठिन होने से इस बीमारी को अश्मरी या पथरी कहते हैं.
पथरी की उत्पति में प्रकार भेद के कारण भी अनेक होते हैं. तथापि संशोधन का अभाव और आहार-विहार का विकार से ही दो प्रधान कारण सामान्यता मिलते हैं. ............................................... बाकी समय मिलने पर अपडेट