गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

अपामार्ग औषधिय पौधा


अपामार्ग =  अपामार्ग भारत में सभी जगह पाया जाता है ,इस की दो जातीय होता है , लाल और दूसरा सफेद . इस के उपयोगी अंग पूरा पंचाग ,  पौधे नैदानिक चिकित्सा  [ मूल, बिज, पत्ते ,तना और पुष्प ] मे काम लिया जाता है .संस्कृत में अपामार्ग शिखरी, किणीही, प्रत्यपुश्पाप्रत्य पुष्पा, मयुरिक , खरंमंजरी. हिंदी में लटजीरा  ,चिरचिटा कहते है .
अपामार्गस्वाद मे कटु , तिक्त स्वाद  ,उष्णवीर्य वाला, तीष्ण, शरीर में दीपन, पेट में पाचन, आतो में सारक, रोचक, अति मात्रा में वमन करनेवाला , ग्राही, शिरोविरेचन [बिजततंडुल] तथा कफ, मेद, वात, अर्श , कडू, उदर, आम ,शूल ,हिक्का और अपची का नाश करनेवाला होता हैं .
  नव्यमत- अपामार्ग तिक्त कटु तीष्ण दीपन अमलातानाश्क रक्तवर्धक, शोधन अश्मरिग्न , मूत्रजनन , मूत्रअमलतानाशक श्वेद्जनन, कफ़गन और पित्त-सारक हैं.. भोजन के पहले अपामार्ग देने से आमाशय का पाचन रस  बढ़ता हैं. और आमाशय की पीडा कम होती हैं. भोजन के बाद देने से आमाशय में अम्लता कम होती हैं और कफ विलीन होता हैं. अपामार्ग से यकृत की पित्त वाहिनियो का शोध कम होता हैं.  यकृत की क्रिया सुधरती हैं और यकृत में रक्त संचार ठीक होने लगता हैं .इसलिए  पित्ताशमरी और अर्श में अपामार्ग देते हैं. अपामार्ग के अंतर गत शार रक्त में शीघ्र मिल जाता हैं. रक्त के रन्जक कण बढ़ते हैं. रक्त का  रंग सुधरती हैं. और रक्तोद्क का शार धर्म बढ़ता हैं. रक्त में मिला शार मूत्रपिंड [गुर्दे],त्वचा फुस्फुस, आमाशय यकृत और   पित्त के दुआरा बाहर आता हैं.  और जिन जिन  अवयवो दुआरा बाहर आता हे उनकी जीवनबिनिमयक्रिया सुधारता हैं. अपामार्ग तरुण और जीर्ण आमवात , संधि शोध ,गण्डमाला,मूत्रपिन्दोदर .हर्द्योदर,अश्मरी , बस्तिशोध मूत्रपिडोशोध, श्वास नालिकाशोध, प्लीहावृदी और यकृतवृधि इन  रोगों में हित कर हैं. रतोधी में अपामार्ग मूल चूर्ण १/२ -- १ तोला रात को सोते समय दूध  के साथ देना और रोगी को पोष्टिक आहार खाने को देना लाभप्रद हैं. आख का  फूला  में अपामार्ग मूल शहद में घीसकर लगाते हैं.[ डा.वा .ग देशाई ]

अपामार्ग वर्षायु क्षुप जातीय पौधा होता है .वर्षा के साथ अंकुरित होता हैं.और और सर्दी के मौसम में पुष्प-फलो से भरा होता हैं. गर्मी मौसम में बिज पक जाते है जो चावल के सामान दीखते इस कारण इस को तांदूळ कहते है .
नवम्बर महीने में इस का पंचांग छाया में सुखा कर बंद पत्रों में रखना चाहिए .इस को एक वर्ष तक काम में लेना चाहिए .मुख मार्ग के अलावा नाक से सुघाने से आधा शीशी का दर्द ,मिर्गी और बेहोशी में आराम मिलता है.
चर्म रोगों  में मूल को पिस कर लेप करते है.
पत्तो का दात  दर्द और पुरानी केविटी को भरने कभी मदद करता है.
दूषित वृणो पर स्व रस लगाते हैं. जहरीले जानवरों के काटे जाने पर विशेष तौर से इस का लेप किया जाता हैं. जैसे-सर्पदंश ,बिचुदंश या जहरीले कीडे मकोडे के काटे जाने पर इस अपामार्ग के ताजा स्वरस पिलाने से और लगा देने से जहर उतर जाता है . आदिवासी शोथ वेदना और  धारदार औजार से कटने पर आज भी इस का पुल्टिस का लेप करते हैं. इस के बीजो की खीर खाने से भूख नही लगती है इस का प्रयोग साधू सन्यासी करते है ..

1 टिप्पणी:

  1. कमाल का पौधा है ये यदि जानकारी हो तो इसका बहुत लाभ उठाया जा सकता है !

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