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रविवार, 7 सितंबर 2014

तन-मन का मनोविज्ञान

सगुण और निर्गुण
भारतीय वैदिक मनोयोग से जुड़ा आधुनिक मनोविज्ञान में सामजस्य ताल-मेल की कोशिशें नहीं की गयी. जब की वैदिक मनोविज्ञान ही बृह्म मनोविज्ञान हैं, आधुनिक की जननी ही वैदिक मनोविज्ञान हैं, आधुनिकतम में वैदिक सगुण और निर्गुण शब्दों को प्रकट और अप्रकट के रूप में लिखा जा सकता. किसी शब्द संज्ञा के अप्रकट के गुणों को पहचाना जा सकता जो अनुभवी होने से अनुमान प्रमाण तौर पूर्वाभास हो जाता अर्थार्त धुआँ होने से अनुमान लगाया जा सकता हैं की जिस स्थान पर धुआँ निकालने की अवस्थाओं में ये देख कर अनुमान लगाया जा सकता हैं की ये धुआँ इसी प्रकार से आगे आग लगाने को व्यवस्थित किया जा सकता हैं, अथवा आगे आग को लगाना अथवा बुझाना हैं, काठ [ लकड़ी ] में आग है जो निर्गुण हैं यानि अदृश्यता से हैं, गन्ना में रस, तिल में तेल, दूध में मलाई  सगुण जो प्रत्यक्ष दीखता हैं. लकड़ी जल रही जिसमें आग दिखाई देती, गुलाब का फुल गुलाबी होता, परन्तु निर्गुण का प्रत्यक्षिकरण होता की गुलाब बगीचे में पैदावार होता हैं, कांटेदार टहनी होती हैं, गुलाब का इत्र बनाया जाता हैं, यानी एक सिक्के के दो पहलू होते हैं निर्गुण और सगुण  -  इसी प्रकार से मनोरोगी के रोग का इलाज किया जाता की दिखाई देने वाला और नहीं दिखाई देने वाला रोग जो शारीरिक के साथ मानसिकता जो परस्पर एक दुसरे को कितना प्रभावित करता हैं.                  

शनिवार, 2 नवंबर 2013

दुःख

दुःख
प्रत्यक्ष दिखाई देने वालो पदार्थों से दुःख की निवृति नही होती. जैसे भोजन करने से पूर्ण तृप्ति होने का अहसास होता की अब भोजन की आवश्यकता नही किंतु कुछ ही काल के बाद फिर से भूख लग जाती हैं, इसी प्रकार से बीमार के लिए औषधि सेवन करते हुए भी बीमारी का बढ़ाना देखा जाता हैं, या दवाई के खाने से फिर कुछ समय के लिए तो लगता की बीमारी ठीक हो गई परन्तु कुछ समय बाद फिर उत्पन्न हो जाती हैं. इसी प्रकार से स्त्री-पुरुष, मकान, धन, प्रतिस्पर्धा के परिणाम इत्यादि भौतिक पदार्थों से क्षणिक ख़ुशी मिलती हैं. परन्तु दुख की निवृति होती नही दिखाई देती, जैसे नही बुझाने वाली कामनाओं का यज्ञ आहुति में कामनाओं रूपी घी का निरंतर प्रवेश अग्नि को जलाता रहता हैं. जिस तत्वों या कारणों से हमें ख़ुशी मिलती उसी कारणों से दुःख की प्राप्ति होती हैं. अथार्त  इस से ये सिद्ध होता ही दृश्य पदार्थ हमको पूर्णरूपेण दुखों को समाप्त करने में असफल होता हैं .इस लिए वैदिक मनोविज्ञान का जानना जरूरी होता हैं.