हमारा शारीर निर्माण = भारत में घर घर में यह कहावत खी जाती है ,जैसा खाओंगे अन्न वैसा होगा तन और मन्न. शिशु का माता के गर्भ में अपनी माता से और शिशु के शैशवावस्था में जो आहार मिलता है उससे ही बालक का निम्न प्रकार से शरीर निर्माण होता है . प्रमस्तिष्कीय प्रधान शरीर निर्माण = शिशु का जीवन माता के गर्भावस्था में और उसके बाद शैशवावस्था में दोषपूर्ण अल्पपोषण आहार से बालक को मानसिक विकास तथा शारीरिक विकास को अवरुद्ध ही नही करता बल्कि बीमार होने की सम्भावनाए भी बढा देता है .इन दोनों ही अवस्थाओ में अगर बालक को पोष्टिक आहर से वंचित रखा जाता है तो शारीरिक विकास के साथ मानसिक विकास की वृदि रुक जाती है या कमजोर हो जाती है .जिससे बालक का भविष्य नाजुक संवेदनशील ,चिडचिडापन ,दुबले-पतले ,अधिक धार्मिक ,चिंता अधिक ,मनस्ताप ,मनोविदिलता और पलायनवादी हो जाते है जिसको प्रमस्तिष्कीय प्रधान तमोगुणी में कभी कभी भावात्मक रजोगुणी का प्रभाव भी देखने को मिलता है जिसके कारण मन की अस्थिरता होती है . आतराग प्रधान शरीर निर्माण = शिशु का जीवन माता के गर्भावस्था में और उसके बाद शैशवावस्था में दोषपूर्ण अतिपोषण आहार से बालक को मानसिक विकास और शारीरिक विकास को अवरुद्ध ही नही करता बल्कि बीमार होने की सम्भावनाए भी बढ़ा देता है .इन दोनों ही अवस्थाओ में में अगर बालक को पोष्टिक आहार से वंचित रखा जाता है तो शारीरिक विकास के साथ मानसिक विकास की वृद्धि रुक जाती है या कमजोर हो जाती है .जिस से बालक का भविष्य पर प्रभाव निम्न प्रकार से पडेगा ,मानसिक परिवर्तन में उत्साह अधिक होगा स्वभाव से सुख ,भावुक कम ,उत्साह और अवसाद अधिक होगा ,आराम की रूचि शरीर से गोल-मटोल ,नरम स्वभाव. आतराग प्रधान सतोगुणी का प्रभाव दिखेगा . कायप्रधान शरीर निर्माण = शिशु का जीवन माता के गर्भ में और उसके बाद शैशवावस्था में संतुलित पोषक आहार खिलाने से उस बालक का मानसिक विकास और शारीरिक विकास में वृद्धिशील तो होगी ही साथ ही साथ बीमार होने की संभावनाए कम पड़ जायेगी या मिट जायेगी और कोई भी खतरा नही रहेगा और इन दोनों ही अवस्था में मानसिक विकास तथा शारीरिक विकास के साथ शरीर पुष्ट व् गठीला दिखेगा ,स्वभाव से क्रियाशील ,आक्रमक ,विवेकवान ,कम धार्मिक ,स्फूर्तिवान,शक्तिशाली ,और खेद-विषाद नही पाया जाता है एवं वे बालक किसी भी खतरे की स्थिति का आसानी से निपट सकते है ,ये रजोगुणी कायप्रधान के प्रभाव के बनते है .
अपनी दिशा बदलो दशा अपने आप बदल जाएगी ,.. Change its direction will change on its own.. AAYURVED, MODREN, NUTRITION DIET & PSYCOLOGY गोपनीय ऑनलाइन परामर्श -- आपको हमारा परामर्श गोपनीयता की गारंटी है. हमारा ब्लॉग्स्पॉट, विश्वसनीय, सुरक्षित, और निजी है. एक उर्जावान, दोस्ताना, पेशेवर वातावरण में भौतिक चिकित्सा के लिए सर्वोत्तम संभव कार्यक्रम प्रदान करना है.
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गुरुवार, 19 जुलाई 2012
हमारा शारीर निर्माण = मानसिक विकास तथा शारीरिक विकास के साथ शरीर पुष्ट व् गठीला दिखेगा ,स्वभाव से क्रियाशील ,आक्रमक ,विवेकवान ,कम धार्मिक ,स्फूर्तिवान,शक्तिशाली ,और खेद-विषाद नही पाया जाता है एवं वे बालक किसी भी खतरे की स्थिति का आसानी से निपट सकते है ,ये रजोगुणी कायप्रधान के प्रभाव के बनते है .
लेबल:
diet motivation
M.A. Psychology, DNYS, DNHE, CHMS, Aayurved Ratn, CBT/ERP Therapy और संपर्क नंबर 98290 85951
रविवार, 22 अप्रैल 2012
diet motivation = माता की अवस्था = माता की अवस्था को तिन आयाम के प्रकारों का संजीवन देना पड़ता है ,१. माता को अपनी
माता की अवस्था = माता की अवस्था को तिन आयाम के प्रकारों का संजीवन देना पड़ता है ,१. माता को अपनी सन्तान को जन्म के पूर्व अपने पेट में पालना पड़ता जिसका आहर सम्बन्ध बहुत गहरा निभाना पड़ता .क्योकि माता के गर्भ में पलते बच्चे को भी अच्छा आहार मिलना आवश्यक होता है .ताकि ओजस्वी बल बुद्धि और ज्ञानवान सन्तान पैदा हो का ध्यान रक्खना पड़ता है, २. बच्चा पैदा होने के बाद आहार विहार के पालन पोषण का निरंतर ध्यान रखना पड़ता है .माता जानती की कौन सा आहर अपनी परम्परा को जीवित रखकर देना जरूरी है और किस मौसम में कौन सा आहर के साथ पहनावा जरूरी है और, ३.शिक्षा का प्रवेश तीसरी अवस्था में बच्चे के वृदि विकाश का समय होता है ,अब साथ ही साथ आघुनिक जीवन शैली की पालना का लाभ कम और नुकसान ज्यादा स्वास्थ के मामले में बढ़ता नजर आ रहा है कारण की बढती उत्पकता के प्रसारण के माध्यमो से प्रभावित जंक आहारो की मांग बढ़ जाती है जिस से आज बच्चो को भी आज वो रोग जो जीवन शैली के कारण लग रहे जिसका पूर्व बीते वर्षो में नही होते थे .अब माता के ज्ञान में विज्ञानं की आवश्यकता का होना जरूरी हो गया की अपना पुत्र बीमार खाने पिने तथा उठने बैठने के कारण जो आज के पर्यावरण के आधुनिक जीवन शैली के नाम से बिमारिया बढ़ रही है . उन से कैसे बचा जा सकता है .
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