भ्रम और सत्य में बहुत अंतर होता है -_- कई बार नकल में अनुभव हीनता के कारण इन्सान जो ग़लतियाँ करता इस का परिणाम आने के बाद भी स्वीकार नही करता जिसकी आदत बन चुकी होती है क्यों की भ्रम में ही आदत को अपने अहम को ठेस नही लगे इस लिए जीता है . मान ली जिये की ऊंट-ऊंटनी में जो भेद नही कर पता उस के लिए दोनों दुधारू पशु है ,दिखने में नर - मादा दोनों समांतर दिखाई देते है परन्तु लगन से देखा जाए तो पता चलता है की दोनों मे अंतर है .अज्ञात के लालच में ऊंट के पीछे सियार चलता की उस का होट गिरे गा और में आहार के रूप में खाऊंगा ,जब की ऐसा होता नहीं है .इस प्रकार आज काल लोग भ्रम की चाहत में ज्यातर फेसबुक पर पीछा करते नजर आ रहे है जो भरम के आनंद से आन्द्दित हो रहे है और युवा अपने जीवन के भी मूल्यवान समय को खो रहे है ,फेसबुक अच्छी-ख़ासी शिक्षा पूर्ण है अगर इसका सही मायने मे उपयोग लिया जाए और कुछ लोग भ्रम से बाहर है .अपना व्यवसाय , शिक्षा ,ज्ञान ,अभिवृदी , आय ,स्वस्थ्य आदि को आदान प्रदान को बढ़ावा दे रहे परन्तु समय बर्बादी ज्यादातर लोग कर रहे है .
अपनी दिशा बदलो दशा अपने आप बदल जाएगी ,.. Change its direction will change on its own.. AAYURVED, MODREN, NUTRITION DIET & PSYCOLOGY गोपनीय ऑनलाइन परामर्श -- आपको हमारा परामर्श गोपनीयता की गारंटी है. हमारा ब्लॉग्स्पॉट, विश्वसनीय, सुरक्षित, और निजी है. एक उर्जावान, दोस्ताना, पेशेवर वातावरण में भौतिक चिकित्सा के लिए सर्वोत्तम संभव कार्यक्रम प्रदान करना है.
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सोमवार, 11 मार्च 2013
फेसबुक पर सत्य-असत्य का श्रम लिए युवा इस प्रकार से जीते है .
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गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013
मेरी अपनी आधुनिक जीवनशैली
सकारात्मक तर्क जब ज्यादा होने लगे तो आप नकारात्मक दिशा की दशाओं में इस प्रकार घिर सकते हैं जिस से आप अपनी प्रगतिशील अवस्थाओं [ सफलताओं ] में बंधक खुद बनते है .मौसम वर्षा का था, दो दोस्त थे A और B जो दोनों साथ-साथ सो रहे थें, A दोस्त आयु में B दोस्त से बड़ा था. A दोस्त ने करवट बदल कर B दोस्त से कहा, बाहर जाकर देखो की वर्षा आ रही हैं या रुक गई , B दोस्त के उठाने की इच्छा नही थीं तो उस ने तर्क देते कहा की बाहर से अभी अभी कुत्ता आया इस के शरीर पर हाथ गुमा [ फेर ] कर पता कर लो की इस का शरीर भीगा हुआ है, की नही, भीगा तो वर्षा आ रही ,सुखा है तो वर्षा बंद हो गई. थोड़ी देर बाद A दोस्त ने B दोस्त से कहा की बल्ब की रौशनी सीधे आँखों पर पड रही उठ लाईट बंद कर दो, तो B दोस्त बोला की वर्षा का मौसम है, इस को बंद करना ठीक नही. आप मुंह पर रुमाल डाल दो नींद आ जाएगी. थोड़ी देर बाद ठंडी हवा आने लगी तो A दोस्त ने फिर B दोस्त से कहा आप दरवाज़े को बंद कर दे ठंडी हवा आ रही है, तो B दोस्त ने कहा की आप दरवाज़े को अपने पैर से धक्का देकर बंद कर दें, दरवाजा आप के नजदीक है. और A दोस्त ने वैसे ही दरवाज़ा बंद कर दिया. A दोस्त ने बाद कहा की अब तो दरवाज़ा के कुण्डी लगा दें तो फिर B दोस्त ने तर्क दिया की तीन काम मेरे तर्क से हुए एक काम यह आप कर दो .
- व्यक्तित्व का विकास इस बातों पर निर्भर करता की आप में वो सकारात्मक पहलुओं को कितना महत्वपूर्ण बातों को आप बखूबी से निभाते है 1 क्या आप दुसरों की सराहना करते है या नहीं 2 दुसरों के प्रति आभार प्रकट करते या नहीं 3 मिलजुलकर ,बांट कर श्रेय लेते है या नहीं 4 नया पढ़ना करते है या नहीं 5 नये विचार का उपयोग करते या नहीं 6 अपने ज्ञान विचारों को साझा करते है या नहीं 7 ख़ुशी बाँटते या सदा गुस्से में रहते है 8 परिवर्तन से साहस या भय 9 प्रयोग की तैयारी ज़मीनी या हवाई आंकड़े 10 माफ़ करने के भाव अथवा सदा दुश्मनी के विचार 11 असफलता अपने पर या दुसरों पर 12 आदर्श किताबों को पढ़ना या नहीं 13 क्या बनना कोई लक्ष्य या नहीं 14 सभी को शुभकामनाएं या नहीं 15 जीवन का लक्ष्य या नहीं 16 लगातार सीखना या दुसरों की बातें ही करना 17 अपने आप में सुधार लाने की कोशिश करते या सम्पूर्णता वादी हैं देखिये आप भी अपनी जिंदगी भर व्यक्तित्व विकास को . 17 सवालों के 1 सवाल के 6 नम्बर [ अंक ] है हाँ के लिए .तुलना कीजिये की कितना अंकों को आप प्राप्त करते है, जो अपने सकारात्मक होने का परिणाम आप जानेगें .
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शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012
मेरे मन की, मेरी समस्याओं को किस को बताऊ !
मनोविज्ञान = मन का विज्ञान , मन आत्मा से सटा ठीक एक सिक्के के दो पहलुओं में एक आत्मा और दूसरा मन होता है . मन में विचार आते बुद्धि के रास्ते जो मानव की इन्द्रियों के प्रेरणा से शरीर की वर्तमान स्थिति जो, प्रेरणा ,ध्यान , धारणा,अनुभूति, व्यक्तित्व, व्यवहार, सबंधो का पारंपरिक रूप में अवधारणा जो चेतन से पूर्व अवचेतन या अर्धचेतन के रूप में विधमान रहती है उस को मानसिक कार्यो से व्यावहारिक गतिविधियों को अनुसंधानकर्ताओं का कार्य होता है .जिसमे व्यक्तिगत ,समूहों या असामाजिकता भी हो सकता है को संज्ञात्मक जो मानसिकता जो शारीरिक व्यवहार का कारणों का निवारणार्थ खोज ..खाने-पीने ,ओढ़ने-पहनने ,बातचीत में आधुनिक जीवन शैली से विकृत ,विप्रेरना को सुधारना और नई सूझ उत्पन्न करना मनोविज्ञान के चिकित्सकों का कार्य होता है , मेरी समस्याओं को किस को बताए उलझने बनी रहती है तो .आप को कोई परेशानी हो तो इसी पेज पर सम्पर्क करे ..
भारतीय जीवन विज्ञान दर्शन बीज से शुरू होता है ...... .. गर्भावस्था जिसमें पहले दो प्रकार का समर्थन करता है एक सिक्का के रूप में वर्गीकृत के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं दो कल्याण पहलुओं है कि नकारात्मक पहलू उत्पादन के सकारात्मक पहलू पर बनाने की जरूरत है मानसिक और शारीरिक जीवन देता है कि में सन्तुलन .भारतीय जीवन के लिए जारी रखा अनाज मन की भूमिका को प्रधानता खाने के लिए अनाज होगा ... विचार और मन विज्ञान ज्ञान को विकसित करने के लिए है ......................
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गुरुवार, 27 दिसंबर 2012
हम हमारा जीवन प्रबंधन कैसे करे !
हम हमारा जीवन प्रबंधन कैसे करे ! मन सतोगुण किस प्रकार से रजोगुण में परिवर्तन हो जाता है कहने का मतलब काम से क्रोध में परिवर्तन हो जाता है ,जिस तरह इमली के सम्पर्क से दूध दही में बदल जाता है .इसी प्रकार से मोह निरंतर बना रहता है जिस से संतुष्टि नही मिलती तब, मोह को टूटने देख क्रोध में परिवर्तित हो जाता है .काम-क्रोध को आत्मिक बना कर हनुमानजी की तरह शुक्ष्म रूप से विराट् रूप समान बना कर काम रूपी लंका को जला डाले ,या जलाया जा सकता है ...
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बुधवार, 26 दिसंबर 2012
अपना जीवन प्रबंधन कैसे करे .
इस भौतिक-जीवन में मानव के आत्मा मे कर्म बंधन की परते होती है . इन कर्म बंधन के कारण विकास में बाधा आती है , जिससे चेतना शून्य यानि धूमल हो जाती है। यह आवरण काम ही है, जो विभिन्न रूपों में होती है . अग्नि में धुआँ , दर्पण पर धूल ,और भ्रूण पर गर्भाशय . कहने का मतलब कही धुआँ है तो अग्नि का होना अवश्य होता है, अर्थात मन में काम के विचार है, तो क्रोध पीछे अवश्य होगा .मन रूपी दर्पण पर धूल अवश्य आती है जिस को उदाहरण की पशु-पक्षिओ के समान वाली बुद्धि हो जाती है ,इस लिए प्रेरणा से पशुत्त्व दूर किया जाता है . गर्भाशय का आवरण में भ्रूण का मतलब उन वृक्षों से तुलना की जाती है जिस में जीव तो होता परन्तु चलने-फिरना में स्वतंत्र नही होते है।मन में विचार के अवरोध को धुएँ की भाती को ठीक से नियंत्रण किया जाए तो मन की अग्नि प्रज्वलित हो सकती है ...
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शनिवार, 10 नवंबर 2012
संतुलित आहार पोषण का मनोविज्ञान महत्व कैसे जाने
`मन का विज्ञानं , मनोविज्ञान = मन की यात्रा में भ्रम जंजाल होता है ,रास्ते में एक चोराया [ चार दिशा ] आता उस समय भ्रम दिशा से मुक्ति देना , मिलना या अधिक विचारो से मुक्त होना . मैदानी भाग से हटकर समुन्द्र में जब सूर्य उदय होने की दिशा का भ्रम होता है, उस अवस्था में मन की स्थति को जानना ही मनोविज्ञान कहलाता है .सोना और पीतल दोनों पिली धातु होती ,पीलापन भ्रम पैदा करता है, इस मनोदशा के ज्ञान को विज्ञानं जानना ही, भ्रम की मनो गति में उत्पन्न प्रभावी विसंगति को दूर करना . जैसे हम परिवार के चार सदस्य एक चार रास्तो की भाती है. मेने अपने परिवार के सभी सदस्यों के सामने चढाई शब्द का वाक्यम प्रयोग करने को कहा तो [ १ ] श्री मती जी, ने कहा मुल्हाने में दरगाह पर चादर चढाई [ २ ] पुत्री ने कहा साधु ने एक लोटा भांग चढाई [ ३ ] पुत्र, ने, कहा धुड सवार ने घोड़े पर टांग चड़ाई [ ४ ] पुत्र २, ने कहा हिमालय की कठिन चढाई होती है . इस प्रकार से चारो सदस्यों में प्रतिएक के शाब्दिक भाव में मनोगती से उत्पन्न उत्तेजनाओ के प्रभावी विसंगति नजर आ रही है ,सभी के निम्न भाव विचार इस प्रकार से है .[ १ ] चढाई = ओढ़ना [ २ ] चढ़ाई = पीना [ ३ ] चढ़ाई = सवारी [ ४ ] चढ़ाई = चढ़ाई , इस प्रकार से सभी चारो सदस्यों के आप सी विचार , तर्क , उपकल्पना या मन के उत्तेजित भाव एक दुसरे से मेल नही खाते, जिस से मन में भ्रम की स्थति पैदा होती और विचारो कर्म बंधन आ ही जाता है . बुद्धि का कुपोषण = आप जिसके बिच [ पर्यावरण ] में खड़े हो ,वही पर अपने आप को समज लेना ,एक विचार बंधन आ ही जाता है , पैदा होते समय खाली अभ्यास पुस्तिका की तरह होते हो जो सिखा उसे लिखते हो ,सिखा उसी को पढ़ते हो या रटते हो यही अभ्यास होने पर उसी आदत पर विकास सुरु होता है .जैसे मेमनों के पर्यावरण समूह में पैदा हुआ शेर का बच्चा के सभी लक्षन मेमनों जैसे ही होते है ,परन्तु आत्म दर्शन होने पर मेमने स्वत ही दूर हो जाती है और अपनी दिन चर्या अलग-अलग शुरू हो जाती है, जो संस्कारो से ज्ञान पोषण अपने आप आ ही जाता है . ज्ञान की अत्यधिकता = दो छात्र अपनी गणित विज्ञानं की शिक्षा पूर्ण करके पोषण विज्ञानं की शिक्षा में प्रवेश लिया ,स्वय प्रेरित पोषण विज्ञानं को पढ़ने लगे ,किसी एक कक्षा में ३० विद्यार्थि थे, उन ३० विद्यार्थियो का खाना पोषण विज्ञानं के अनुसार सामूहिक बनाना था, की १० विधार्थी को वसा की कमी , १० विधार्थी को आयरन की कमी ,२० विद्यार्थी को प्रोटीन की कमी इस प्रकार दोनों छात्रो ने पोषण आहार का औसत निकला की प्रतिएक को तुलनात्मक औसत वसा ,आयरन और प्रोटीन की मात्रा की कुल आवश्यकता होगी ,इस प्रकार के आंकड़े तो अति ज्ञान के कारण पोषण आहार के आंकड़े सभी गलत होंगे, जो अति ज्ञान के बंधन में अहम आ जायेगा ,परन्तु यह पर औसत आंकड़ो की जगह प्रति व्यक्ति के भिन्न भिन्न आवश्यकताओ पर ध्यान देना जरूरी होता है .
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गुरुवार, 1 नवंबर 2012
आत्म ,मन या बुद्धि में ज्ञान की धारणा भक्ति ,ज्ञान ,ध्यान ,कर्म और योग की राह या को अनु ग्रह करने से आत्म बल प्राप्त कर सकते है
खोया हुआ आत्म बल कैसे प्राप्त करे ! आप अपना खोया आत्मबल वापस प्राप्त कर सकते है ,जिसके लिए आप को धीरज की आवश्यकता होगी .दुष्कर और दुरूह भाग्य को भी मोड़-मरोड़ कर अपने अनुकूल बनाया जा सकता है .सभी तरह के विंध्य-बाधाओं को धूल-धूमित और धराशाही किया जा सकता है,असंभव को संभव बनाया जा सकता है, जिसके लिए अपने मनोविज्ञान को जानना जरूरी होता है की इस पिंड में अखण्ड वलय कार चेतना घोड़ों के वेग से कौलुह के बैल की तरह कहा दौड़ रही है .एक स्थिर चेतना से यह पिंड सूर्य के समान प्रकाश पाकर वेदान्त का कमल खिलता है, चेतना आठ अवस्था में रहती है. चेतना अपूर्व, नित्या, स्वयं प्रकाशित ,चंचलता,अक्षय और आनंद का स्रोत है .चेतना जागती-सोती रहती है. आठ मार्ग से .जों तरह तरह से सांसारिक गणित लगती रहती है .जिसको व्यावासायित्मका बुद्धि कह सकते ,इस को पटवारी बुद्धि भी कह सकते है .जों जोड़-तोड़ ,कुटिलता-क्रूरता में निरंतर बनी रहने के कारण साधना-समर्पण में विरोध करती है .आत्म ,मन या बुद्धि में ज्ञान की धारणा भक्ति ,ज्ञान ,ध्यान ,कर्म और योग की राह या को अनु ग्रह करने से आत्म बल प्राप्त कर सकते है ...जिससे आप पुनः अध्यात्मवेत्ता हो जायेंगे ..मन तत्व के ज्ञान हो जायेंगे .
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गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012
मन की बीमारीयों को कैसे मिटाएँ ,मन को हल्का कीजिये इस लेख को पढ़कर
अपने जीवनशैली में दैहिक पीड़ाओ को कैसे कम करे ! मेरे दो पुत्र है , हितेंद्र्पाल सिंह ,विरेन्द्रपाल सिंह मे ने दोनों को आधा आधा किलो मिठाई दि और कहा आपसी इच्छानुसार इस को उपयोग करो परन्तु एक शर्त है की यह मिठाई के उपयोग का आज वर्णन नही करेंगे ठीक एक गूंगे का अनुभव लेकर दिन को बिताना है और इन की माता से कहा आप, को दोनों बेटों को जों मिठाई दि उसका वर्णन करना है .श्रीमती जी [ मेरी पत्नी ] बोली गूंगे के स्वाद को में कैसे जानू की किसको कैसा स्वाद लगा.दूसरे दिन मैने हितेंद्र्पाल सिंह से पूछा तो उसने बताया की कल वाली मिठाई को खाया बहुत स्वादिष्ट थी ,अब दूसरे पुत्र विरेन्द्रपाल सिंह से पूछा तो उसने बताया की मैने और मेरे चार मित्रों में मिलकर मिठाई खाया बहुत मझा [ आनंद ] आया . इसके बाद परिवार में मैने समझा या ठीक इन दोनों भाईयो की तरह दो प्रकार के लोगों का समाज में जीना पाया जाता जों अपने अपने दर्द या बीमारी को भागते यानि एक हितेंद्र्पाल सिंह की तरह मन की बीमारी को अकेले अकेले लेकर फिरता , दूसरा पुत्र विरेन्द्रपाल सिंह जों अपने मन की बीमारी की बात बता देता जिससे मन हल्का हो जाता .आप अपने मन की बीमारी को गूंगे की तरह दबाने या छुपाएँ नही बैठे मुंह खोल कर अपने दिल की बात हो हल्कापन कर ले ताकि आप मनोरोगी या दैहिक पीड़ाओं को मिटा सकते है..
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बुधवार, 17 अक्टूबर 2012
गुणों का महत्व होता ,संख्या का कोई महत्व नही होता से जीवन प्रबंधन करे !
आप की बात सही परन्तु संख्या को कोई महत्व नही होता ,महत्व तो गुणों का होता है .रात में करोड़ो तारों की संख्या होती मगर पूनम के चाँद के सामने उनके गुण फीका होते है .मगर उस पूनम के चाँद का महत्व तब फीका पड जाता है,जब दूज के चाँद के लिए उस का दर्शन का इंतजार करते और भारत में व्यापारी तेजी मंदी की भविष्य वाणी देखी जाती है ,वैसे ही बहुत सारी संताने हो और कमाने लायक या परिवार को ठीक ढंग से पाल नही सके व् समाज पर बोझ हो ओर एक ही बेटा हो और परिवार को तो पाले ही साथ साथ समाज को भी मार्गदर्शन दे तो यह पर एक के गुण अनेक की संख्या से बेहतरीन साबित होता है . इस आप गुण वान बने और अपनी औलाद को गुण वान बना ये ... और अपना जीवन को प्रबंधित की जिये
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आप स्वय अपनी प्रकृति के मानसिकशक्तिमूल के पात्र बन जायेंगे
अपना जीवन प्रबंधन कैसे करे ! आप को मालूम होगा की आप जों कुछ है उसके पिच्छे प्रमुख बात रही है की अपनी सोच ,इस विचार या सोच के कारण ही आप की अभिवर्ती और आकृति बनी होती और हम अच्छे बुरे होने का अभिनय कर सकते है फिर भी हमारे में हम सुधरने के प्रयास नही करते .मेरा तीन चित्रों से आप को कल्पना के सागर में ले जाता हुं [ १ ] एक कमरे में अश्लील चित्र लगे है , [ २ ] दूसरे कमरे में वीर क्रांति कारी योद्धा के चित्र लगे और [ ३ ] तीसरे में भगवान के चित्र लगे है .ज्योही आप पहले कमरे में प्रवेश करते आप की वासनात्मक विचारधारा आ ही जाएगी.इस के बाद दूसरे कमरे में प्रवेश करते तो आप में जोशी ले विचारधारा आ ही जाएगी और इसके बाद आप तीसरे कमरे में जाते है तो भगवान से प्रार्थनाओं के विचारधारा का आना शुरु हो जाता है .अब आप जान ली जिये की आप उन तीनों कमरों में किस कमरे में ज्यादा अपने आप को रोकना चाहेंगे , वैसी ही आप स्वंय अपनी प्रकृति के मानसिकशक्तिमूल के पात्र बन जायेंगे .
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रविवार, 14 अक्टूबर 2012
हम अपना जीवन प्रबन्धन कैसे करे
जीवन प्रबंधन कैसे करे ! ! आप को समाज में जीना पड़ता है जिसमे माता-पिता,जीवन साथी, भाई-बहन,औलाद ,दोस्तों के साथ मेहमान या अजनबी के साथ भी समय बिताना होता है जिसमे मुख्य सात प्रकार से ओर जीवन साथी से आठ प्रकार से जीवन मूल्यों को विकसित करना जरूरी होता है [ १ ] परस्पर संबंध आप के व् जिनसे व्यवहार है उन से उत्तम किस्म के सम्बन्ध होने चाहिए [ २ ] परस्पर कार्य क्षमता एक दूसरे की कार्य क्षमता समान रूप से होनी चाहिए [ ३ ] एक दूसरे की को समझने की शक्ति = एक दूसरे को समझने की कोशिश करनी चाहिए, भरोसा करना जरूरी होता है [ ४ ] परस्पर प्राकृतिक स्वभाव= एक दुसरेके प्राकृतिक स्वभाव होना जरूरी है ताकि रिश्ता अच्छा निभा सके [ ५ ] एक दूसरे का विवेक संतुलन = एक दूसरे के विवेक संतुलन बना ये रखे जिससे आपा खोया नही जाता है [ ६ ] एक दूसरे की अभी रूचि = एक दूसरे की अभी रूचि का ध्यान पूर्वक व्यवहारों की पालना करे [ ७ ] एक दूसरे की जीवन शैली व्यवहार = एक दूसरे की जीवनशैली का रूचि पूर्वक ध्यान पूर्वक व्यवहार बना ये और [ ८ ] शारीरिक संबंध एवं सन्तान पक्ष = अब बारी आती अपने जीवन साथी से जों सभी सामाजिकता से उपर अपने आप शारीरिक सबंधो का ध्यान रखते हुए अपने सन्तान पक्ष को जवाब दारी से सफलता पूर्वक मांग पूर्ति कर्ता बने ..अगर इस प्रकार से ध्यानमग्न रहेंगे तो आप का जीवन प्रबंध उत्तम कोटि का बन जायेगा ...
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गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012
जीवन प्रबन्धन कैसे करे , ३
जीवन प्रबंधन कैसे करे = मनुष्य को सामाजिक जीवन जीने के लिए बहुत कुछ ज्ञान विज्ञान अर्जित करने की आवश्यकता पड़ती है . हम जो अर्जित करते है इस शरीर के पांच स्थानों के रास्तों या माध्यमो से ग्रहण करते है जैसे कानों से सुनना ,आँखों से देखना ,नाक से सुगंध लेना ,त्वचा से मौसम का अनुभव लेना ,जीभ से स्वाद का लेना .लेते या ग्रहण को पांच विभागों से परन्तु लेते क्यों ,क्या ,किस लिए ,कब और कैसे का भी ध्यान रखना जरूरी होता है .मान ली जिये आप को कोई अच्छा और बुरा सुनाया है तो आप का ध्यान दो शब्द अच्छा या बुरा पर से किसी एक वाक्य के उपर मनन होगा .जो शब्द आप ग्रहण करेगा उस शब्द के अनुसार ही आप नकारात्मक या सकारात्मक सोच बनेगी . परन्तु कभी-कभी हमे मिले जुले या संयुक्त वाक् यों को प्रयोग में लाने पर आपस में विरोध सहन करना पड़ता है जिसका कारण होता हमारी नासमझी से चित अवरोधं से हम समझ नही पाते की किस बातचीत को छानना ,बिनना या फिल्टर करना है और फीर उसका उपयोग करना है .कानो से सुनी हुई बात को शुद्ध कीजिये और उस बात को ग्रहण कीजिये जैसे महिला दाल से कंकर हटा कर दाल काम में लेती और कचरा या कंकर को फेक देती है ...
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बुधवार, 10 अक्टूबर 2012
जीवन प्रबन्धन कैसे करे !तुलसी ,गांजा और भाँग ..
प्रवर्त मार्ग और निवृत मार्ग = प्रवर्त मार्ग और निवृत मार्ग में आहार की भूमिका में पुरक आहार के तौर प्राय मन्दिरों में पोधे लगाये जाते है जिनमें तुलसी तथा भाँग गांजा के प्रभावों का वैज्ञानिक आधारों से विवेचना करते है तो ज्ञात होता है की प्रवर्त मार्ग और निवृत मार्ग का ज्ञान होना आवश्यक है, भारतीय आध्यत्मिक [ आत्मा का ज्ञान ] को समझना जरूरी है. धर परिवार और समाज को चलाना को प्रवर्त मार्ग कहते है एवं भक्तिभाव पूर्वक भगवान को स्मरण करते ब्रह्मचर्य पूर्वक जीवन यापन करना होता है. प्रवर्त मार्गी को वीर्य की आवश्यकता होती है जब की निवृत मार्ग को ब्रह्मचर्य हेतु वीर्य की आवश्यकता नही होती इन दोनों को अपना अपना वीर्यवान और वीर्यं नाशवान आहारो की आवश्यकता होती है. प्रवर्त मार्ग ठाकुर श्री कृष्ण की पूजा अर्चना करते है वो सभी अपना परिवार के विस्तार के लिए पूरक आहार के रूप में तुलसी पोधे को भगवान के सामने लगाते है. ठीक इसी तरह शंकर भगवान के पुजारी ज्यादातर निवृत मार्ग के साधू सन्यासी होते जिनको वीर्य की आवश्यकता नही होती वो लोग शिवशंकर भगवान के मन्दिर में भाँग गांजा लगाते जिसका कारण यही होता है की प्रवर्त एवं निवृत मार्ग के लोगो अपने अपने आवश्यकताओं के अनुसार पूरक आहारो को लिया जा सके ...तुलसी पोधा एक ओषधीय गुणकारी वीर्य वर्धक है और गांजा भाँग वीर्य नाशक पोधा है ..[ भांग को अनुपात से वीर्य स्तंभकारों में प्रयोग किया जाता हैं.].
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मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012
जीवन प्रबन्धन कैसे करे !
जीवन प्रबंधन कैसे करे != अक्षर अपना या परिवार के सदस्यों का जीवन प्रबंध कैसे करे का विचार आता है या अपने जीवन को कैसे सुचारु रूप से चलाने या भोगे .हमे जीवन में धीरे धीरे ही सीखते है कुछ कर्म तुरंत फलदायी होते है और कुछ कर्म देरी से फलदायी होते है जैसे आग से हाथ का जलवा ,दूध से दही का जमाना और आम का बोना और उस का फल लगाना में अंतर होता है ,ठीक वैसी ही हमारे कर्म और कर्म के फलो में अंतर होता है .उसी प्रकार से शिक्षा का ग्रहण करना मे और उस के परिणाम में समय लगता है .हर प्रकार का प्रबंधन छोटे छोटे बच्चों के कदम की तरह ही होता है .आग से हाथ का जलना एक नकारात्मक कर्म होता है ठीक वैसे ही गंदी भाषा या गालिया जल्दी सीखी जाती है और अच्छी बाते या आदत निर्माण का आप जैसा कर्म करेंगे वैसा फल को भोगने में वैसा ही समय लगता है .
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