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गुरुवार, 13 मार्च 2014

रोगों के कारण

आधुनिक जीवनशैली  में रोग जाने का नाम नही ले रहा, जिसकी वजह मनुष्य स्वयं ज़िम्मेदार होता हैं. हमारा शरीर का विकास और वृद्धि होने में हमारे आहार की भूमि का प्रमुखता का कारण होता, धरती पर किसी भी जीव-जन्तु का अपने भोजन पर निर्भरता होना सामान्यतया पाया जाता हैं, पर्यावरण और भौगोलिक स्थिति भिन्न भिन्न हो सकतीं परन्तु भोजन की निर्भरता अवश्यंभावी होती हैं. हमारे आहार में पोषक तत्वों की कमी या अतिरिक्तता होने से पोषक तत्वों में असंतुलित अवस्थाओ का पाया जाना ही रोगों का कारण होता हैं. जैसे - जोड़ों का दर्द, मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और गुप्त रोग इस प्रकार की बीमारियाँ मानव निर्मित अपने स्वयं द्वारा होती हैं, और उसमें सहयोगी अपने विचारधारा का प्रबल सहयोग होता जो स्वयं प्रेरित अथवा उन नकारात्मक पहलुओं को सकारात्मक व्यवसायी विचारधारा की पालनार्थ उन कीं बातों का जैसे अनुबधन कर  लिया जाता हैं. जैसे किसी कंपनी से उत्पादित दवाइयों का सेवन हृदय रोग निवारणार्थ काम में लिया जाता हैं जो कोलेस्ट्रोल को कम करतीं हैं. यदि देखा जाए की कोलेस्ट्रोल बनता किससे है, तो सामान्य बात है की हमारे द्वारा लिया गया भोजन से जो पोषक तत्वों की अतिरिक्तता के कारण, यदि हम उन पोषक तत्वों को कम या बंद कर दे तो ठीक हो सकते हैं.       

बुधवार, 30 जनवरी 2013

नाटकीयता से अपना आपा प्रकटीकरण करना भी स्वभाव होता है

..संत ना छोड़े संतई कोटि मिले कुसंग ,चंदन विष व्यापे नही लिपटे रहत भुजंग .........चंदन और सांप के निकटता के कारण को जानना जरूरी है   , इन दोनों के स्वभाव और प्रभाव के बारे ने पुराने जमाने में बहुत लिख जा चुका है जो संस्कृत में है , सांप जहरीला बहुत होता सभी जानते है और जो जहरीला होता वो गर्म तासीर  का होता है और गर्म तासीर ठंडक को तलाशता है की उस को शांति कहा मिले .आप सभी को देंखे की की जो क्रोध किस्म का आदमी होता वो शांति को खोजते  परन्तु अपने अहंकार के कारण परदे के पीछे शांति चाहता है और सांप की भाती उस अपने स्वभाव को भी छोड़ना नही चाहता है डसने का ,और चंदन तो चंदन शीतल और घोटने पर सुगंघित और ज्यादा सुगंध बढ़ता है ,मानव चंदन को सिर पर इस लिये हि लगाते .इस प्रकार कोई चिंता की बात नही होनी चाहिए की पर्दे के पीछे छिपे पर कौन कौन सा राग या नाटकीय व्यवहार कर रहा हैं .

सोमवार, 28 जनवरी 2013

गिरगिट और टिड्डा स्वभाव की आज के युवाओं की मानसिकता

गिरगिट और टिड्डा स्वभाव की आज के युवाओं की मानसिकता =,आधुनिक जीवन शैली मे आज का ज्यादा  पढा लिखा युवा अपने आप को एक आनंद की अनुभूति के लिए कुंठित मानसिकता को  फेसबुक पर प्रदर्शित कर रहा है ,वो युवा जो सफलता का सरल व जल्दबाजी की मानसिकता रखता है इनका अपना अस्थिर दिमागी व्यक्तित्व होता है .महिला को देख कोई भी पुरुष आकर्षित होना कोई नई बात नही है ,परन्तु कुछ उभयलिंगी  मानसिकता के युवा अपने आप को प्रशंसात्मक आशाओं से गिरी मानसिकता को प्राप्त हेतु वह जवान लड़का से महिला बनने में गुरेज नही करते फेसबुक पर उनकी अपनी एक समस्या होती की उनको कोई जानता नही समाज में की वो भी यहा उपस्थित हैं ,जो इस प्रकार से फ़र्ज़ी आई डी बना कर बहुरुपिया बन कर अपना और समाज के लोगो का मन बहला रहे है . 

कुंठित मानसिकता

फेसबुक पर आधुनिक जीवनशैली में कुंठित मानसिकता के रोगी जो अपने आप को नारी साबित करते हुए आज के युवा = आज की आधुनिक जीवनशैली में युवाओं में हाथ खर्च के विकृत परिणामों के कारण बढती फेसबुक की लोकप्रिय का सकारात्मक की बजाय नकारात्मक असर में आज की स्थिति हिजड़ों की मानसिक विकृति के युवा पीढ़ी दिखाई देती है जो क्षेत्रीय भाषा के साथ हिंदी, अंग्रेजी में पढ़े लिखे युवा शिकार होते जा रहे है, जो माता पिता से अनियत्रित दिखाई दे रही है और संयुक्त मित्रों के साथ स्त्रियोचित व्यवहार का प्रेमालाप करने के लिए नकली आई डी बना कर भोले भाले लोगो को मीठी बोल कर फसा रहे हैं, ज्ञात अनुसंधान से पता चला कि अकेला स्थानीय के अलावा बड़ी टीम के रूप में काल सेंटर में काम करने वाले युवा जो सभी प्रांतों के भाषा के जानकर होते किसी से जब बात करते तो उनको संदेह नही हो और उस समय तुरंत  साथ से स्थानीय भाषाओं जानकर को सेटिंग करा देते जिस से लगता की यह लड़की जैसे पंजाब की हो और तो और ये सुबह 5 बजे से रात्रिकालीन ११ बजे तक एक को ही बातें कर लेते है, नया फसा हुआ या आदत शौकीन भी इस को अपना टाईम पास का ज़रिया अपना रहे है. जिसका परिणाम भी गलत होगा. काम पीड़ित युवा नर नारी के साथ बुजुर्ग भी इस चपेट में आ रहे है. इन सभी में अपनी अपनी योग्यताएं के अनुसार ही ये अपना व्यवहार करते है .और इनकी जानकारी अनुसंधान से पता चलता है आगे होकर ये ही ज्यादातर आवेदन करते है और ये अविवाहित महिला अपने आप को बताते है, और कुछ समीकरण लिख नही सकते. बचिए, बचाए अपनों को और अपने समय को भी इन लुटेरों से, यह अनुसंधान को शुरू किया उस समय से मे ने फेसबुक पर लिखना शुरू किया था ,वो कौन थी      modern lifestyle Fake eunuch mindset of today's youth ...

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

अपने मन से बसा मजाक कभी कभी हमारे लिए घातक बन सकता है !

मानव जीवन में सिखा आचरण भिन्न भिन्न हो सकता है = परन्तु कौन कितना तार्किक है और कौन कितना दार्शनिक , जब इस प्रकार के दो आत्मा का मिलन होता है, तो दो के दिमागी क्षमताओं का प्रदर्शन होता है. ,देखिये आज का  मनोवैज्ञानिक ही पुराने दर्शन शास्त्र को मान्यता देता है .तार्किक बहस को महत्व देता है की ऐसा होता है, या होता ही नही .जैसे आत्मा को देखा नही जा सकता ,विचारों को देखा नही जा सकता .की जब तक कोई अपनी बात नही बताता तो मन की कैसे जाने ,थी उस प्रकार से जैसे दूध में घी होता है ,गन्ने में रस होता, चंदन में खुसबू होती है  या मेंहदी में रंग होता है जो नंगी आँखो से नही देखा जा सकता है परन्तु जिसने मंथन प्रक्रिया देखी हो तो वह बता सकता है की इस दूध से घी कैसे निकला जा सकता है .और गन्ने से रस कैसे निकला जा सकता है ,इस की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है .जैसे दूध को जमाना पड़ता है ,उस के बाद दही बनने की प्रक्रिया होती है ,फिर दही को बिलोना [ मथना ] फिर मक्खन आता है, और उस के बाद उस मक्खन  को उबालना पड़ता है ,इतनी सावधानीपूर्वक के बाद उस दूध से घी मिलता है .जो कच्चे दूध में सभी को वो घी दिखाई नही देता .ठीक उस प्रकार से मनोवृति की अभिवृति सभी नही जान सकते है की किस नर-नारी ने किस कारण से अपनी क्षमताओं को बढ़ावा दिया है ,जो बोया एक छोटे बीज का बना व्रक्ष आज उस को पालना या काटने पसंद नही करता और उस का दोष दूसरे पर मढना चाहता है ... अपने मन से बसा मज़ाक कभी कभी हमारे लिए घातक बन सकता है 

रविवार, 20 जनवरी 2013

.मूढ़ आज की आघुनिक जीवन शैली

हमारी आधुनिक जीवन शैली में मूढ़ प्रदर्शन = आप ने देखा होगा की आधुनिक जीवन शैली में मूढ़ता जो मनोदशा को प्रदर्शित करते हैं . जो अपनी मनोदशा के कारण शारीरिक प्रदर्शन दिखाई देता है ,मूढ़ वे होते है जो कठिन मेहनत करते और उस का फल कोई दूसरा उठता है .वो भार [ वजन ] उठाने में पशुओं की भाती निपट मुर्ख होते है जो नही तो अपने परिश्रम लाभ लेना जानते और अपने के साथ परिवार  वालो को भी दुखी करते है .इस का सबसे उत्तम प्रतीक है गधा ,गधा नही जनता की किसके लिए बोझ उठता है ,घास से ही संतुष्ट रहता है. अपने मालिक की मार से बचने के लिए कम ही सोता है ,गधी की बार बार लात के डर के बावजूद भी अपनी काम तृष्णा को पूरी करता है .जब वह गधी को देख कर प्यार का गीत गाता है तो उस  गाना जिस को लोग रेंगना कहते जिस से लोगो की शांति भंग होती है ,इस प्रकार के सकाम -कर्मियों की कामना है ,उनको नही मालूम की वे किस के किये कर्म कर रहे है और उसका परिणाम कौन प्राप्त करेगा मालूम नही होता है .ठीक ऐसे ही कुछ मानव अपनी मेहनत का फल नाम मात्र का उपयोग करते परन्तु उस गधे की भाती [ समान ] भर पेट या बिना खाने ही अपना कार्य करते रहती है .चाहे उनके पेट में अपचन ,घाव ,वृण आमाशय में भले ही  हो परन्तु वे माया के दास बनकर अपना जीवन गुज़ारते है  ......

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

पर नारी से सुख का भ्रम कैसे दूर करे !

काम - काम जो चरित्र पर दाग करता है - काम, क्रोध, मद, और लोभ ये वो अव गुण है जो चरित्र को उस की हीनता देता है. पर स्त्री हो या पर पुरुष में जो कामुक रूचि जगाता हो और आधुनिक जीवनशैली ने इन अवैध रिश्तो को नई नई परिभाषा मे मान्यताओं प्रचलन किया जा रहा है, परन्तु जो नर नारी शुभ-लाभ, गति ,कल्याण, सुबुद्धि, यश और ऐश्वर्य चाहते हो तो, जिस प्रेमी को दूज का चाँद या पूनम का चाँद समझते यह मात्र भ्रम है. ये घटनाएँ आज कोई नई नही है, इस बात को तुलसी दास जी ने बहुत अच्छी तरह से समझा है जो रावण से गलती हुई, सुंदर कांड में हनुमानजी ने विभिषण को जो सिखाया देह की भाषा, उस को अपने बड़े भाई रावण को समझा रहा है विभीषण,

" जो आपन चाहें कल्याना ,सुजसु सुमति शुभ गति सुख नाना.
   सो पर नारी लिलार गोसाई , तजउ चउथी के चंद की नाई " .

 यानि जो मनुष्य अपना कल्याण, सुंदर यश, सद्बुद्दी, शुभ गति और सुख चाहता हो तो पर स्त्री के ललाट को चौथ के चंद्रमा की तरह त्याग दे. आधुनिक जीवन शैली मे कामवृति से भोग-विलास का दौर चल रहा जो और परिवार में दरार आ रही है  ......    

रविवार, 13 जनवरी 2013

स्पर्श

धीरज धारणा हमारी कैसे बढ़ाया  -आप ने देखा होगा की विचारों की जल्दबाजी अनावश्यक नुकसानदायक होती और विचार टूटने पर गुस्सा आ ही जाता है. और उस समय हम जो निर्णय करते वो गलत परिणाम देता है. मुझे याद आ रहा की मेरे चाचा जी को गायों के पालने का बहुत शौक था. एक बार एक नई गाय ख़रीद कर  लेकर आये और चाची जी को बोला गाय दुधारू है दूध निकाल लेना इस गाय को आज यही पर रखते है नई नई है, दो चार दिन बाद जंगल में चराने ले जाऊँगा, अभी मुझे सभी गायों को चराने जाना है. बाद में ज्यों ही शाम का समय हुआ और चाचा जी गायों की चरा कर लौटे, तब चाचा जी ने पूछा की गाय ने कितना दूध दिया [ निकला ], चाची जी बोली गाय तो दूध नही दिया, चाचा जी बोले क्यों क्या बात हुई, गाय ठीक नही या उसका मन नही लगा होगा, और महावीर भी आज शरारत बहुत की  [ उनका बेटा ]. महावीर बोला पिताजी माता जी ने गाय को लकड़ी से पिटा था. तब चाचा जी ने बताया की बेटा गाय हो या इन्सान सभी प्यार चाहते है, प्यार का स्पर्श मात्र बस, लाओ दूध भरने का बर्तन मैं दूध निकलता.हूँ  इस गाय का. इस प्रकार चाचा जी ने गाय के स्पर्श के लिए गाय को अपने हाथों से सहलाया, गाय के बदन पर हाथ फेर ओर गाय का दूध निकाल लिया .चाचा जी का कहना यह था की, जीव मात्र पशु, पक्षी हो या मनुष्य सभी को प्यार की आवश्यकता होती है .

सोमवार, 7 जनवरी 2013

मानव व्यवहार में कमी या अति के कारण व्यवहारिक प्रभावित स्थति प्रकट होती हें .

आध्यात्मिक बिज विज्ञान हो या मानव जीवन चिकित्सा जगत में देखा जाता हैं की सूक्ष्म शरीर में बीमारी  पहले हो जाती हैं .और स्थूल शरीर में बाद में प्रकट होती है, सूक्ष्म शरीर में जीस तरह फुल की सुगंध आँख देख नही पाती और नाक उस को पहचाना जाता है .वो ज्ञान होने पर .परन्तु जो सूक्ष्म शरीर में बीमारी दो चार महीने पहले आ जाती है, उस का स्थूल शरीर में देरी से पता [ मालूम होता है ] चलता है .पहले पता नही होना और बाद में बड़ी बीमारी होने पर मालूम होना जैसे - कैंसर की बीमारी .ठीक इसी प्रकार से मनोविज्ञान का भी मानना की कुछ सकारात्मक हो या नकारात्मक वार्तालाप के विचार भी बीज़ के रूप में सूक्ष्म रूप से आ जाते है और बाद में बड़े वुक्ष  [ पेड़ ] के  रूप में प्रकट होते है. इस को जानने के लिए सूक्ष्म दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है ,जो मनोविज्ञान से प्राप्त किया जा सकता है. और उस सूक्ष्म ज्ञान को निश्चयात्मक मन के रूप में जाना जाता है .और स्थूलकाय शरीर को जीस दृष्टिकोण से देखते उस को व्यवहारिक कहते है. इस प्रकार से मनो दर्शन को भेद दृष्टिकोण कहते है .एवं शारीरिक क्रियाओं को अभेद दर्शन कहते है ...............................................................................................रह लेख मेरे गुरूजी हजूर हो समर्पण है .....

राख पत रखा पत सब से बड़ा है !

राखपत, रखापत सब से समानता का भाव होता है !                                                                                                                 ' राख पत. रखा पत' ये राजस्थानी कहावत दिल को छु लेने वाली है, राखपत का मतलब होता है .आप से जो  व्यक्ति व्यवहार रखता है इस को राख पत कहते है, जैसा सामने वाला आप को सम्माननीय कथन कहते है , ठीक उस से वापस उतर को देने वाले को सम्मान पूर्व कथन कहते है ,तो आप को इस क्रिया को रखापत कहते , जिस को खड़ी भाषा में जैसे को तेरा भी कहते जो थोड़ा शब्द कड़वाहट भरा लगता है ,आप को कोई अपने मित्र को जन्म दिन की बधाई नही होती है तो आप उस मित्र को सम्माननीय मानकर बधाई देते तो वह मित्र आप को भी सम्मान पूर्वक जब आप जन्म दिन आयेगा को वह ज़रुर आप को बधाई उसी अंदाज़ मे देगा जिसको आप कह सकते की भाई ये तो राख रखा पत है ,कभी कभी आपस मत भेद हो जाते जिस में वहम के साथ मजबूरियों से आवरण [ बंधन ] आ जाते तो आप को बुरा नही मानना चाहिए ,आप का फर्ज बनता की आप पर दर्शक बनिये, इस प्रकार पार दर्शक बनने  से विषादपूर्ण विषय की जो खाई आती उस में आप की पार दर्शाता मेल मिलाप का पुल बनाने या मेल मिलाप की मेंहदी का रचने का कार्य करेगा .   

शनिवार, 5 जनवरी 2013

मैं और मेरा

मन के भाव जो प्रेरणा की गति और विगति = बात जून माह की है ,दोपहर की धुप मे माईनस से तीन मज़दूर आते ,अल्पाहार के रूप में के लिए तीनों ने  कैला 1 दर्जन ख़रीदा, सभी ने चार चार आप में बाट लिया, एक ने केला खाते खाते  केला का छिलका सडक पर फेक दिया ,दूसरे मज़दूर ने केला खाकर छिलके को मेरे पास पड़े कचरा पात्र में फेका और तीसरे ने केला खाने के बाद गाय को छिलका खिला दिया ,देखा जाए तो संस्कार तो तीनों को मिला ही होगा, परन्तु किस ने क्या ग्रहण यह विचार करने की बात है .पहला उद्दंडता और मुर्खता को प्रकट करता है जो तामसी विचार का ,दूसरा समझदार और गुणीजन के भाव प्रकट करता है जो राजसी भाव विचार है । तीसरा उद्दार और सज्जन के भाव प्रकट करता है जो समाजवादी ,समाज सेवा ,मानव सेवा को प्रदर्शित करता है जो सात्विकता को प्रस्तुत करता है . .

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

मै और आप

मै और आप का व्यवहारिक मिलन का ज्ञान
1  मैं तो आप से जानू की मेरा - आत्म विश्वास कैसे बढ़े ,खुद को पसंद करूँ ताकि तब दूसरे मुझ को पसंद करे ,जोशी ला बना रहता हूँ जिससे सामने वाला भी मुझसे जोश में मिलता है नर-नारी से समाज बनता है दो ही अपने अपने अस्तित्व बनाने में दिखाई देता का ही अनुसरण होता है समस्या सभी के साथ आती है                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                            2 मेरे मौजुदगी बोली है विनम्रता और आग्रह पूर्वक देह की भाषा जब किसी के संपर्क में आती है तो मुस्कराते हुए अभिवादन के साथ ,हाथ मिलाते हुए अपना नाम का परिचय देता हूँ इस लिए लोग ध्यान पूर्वक सुनते है अति करता तो लोग बोरियत होते तो संतुलित हो जाता हूँ ,मुस्कराते सहजता रखता हूँ ,बनावटीपन से तो आँखों ने नाटक नजर आ जाता है                                                                                                   3 सामने वाले व्यक्ति के बारे मे भी जानना चाहता हूँ जब किसी से बात करता हूँ तो मेरे लिए वो महत्वपूर्ण हो जाता है इस में अभिमान नही छलकते हुए उस को एहसान करता हूँ की आप वह व्यक्तित्व है जिसका दुनिया में वजूद है और वो सहज सहजता से महसूस करे                                  4 वक्ता के बाद अच्छा श्रोता बनता हुं एक समय में एक काम की भाती [ प्रकार ] से किसी से मिलने पर सहानुभूति पूर्वक बात करता हूँ अगले वक्ता को लगे की मेरी भी बात सुनी जा रही है जिससे याद यादगार की तरह बनी रहे ,ध्यान को वक्ता पर ही लगता हूँ जिस से लगे की उन के लिए महत्वपूर्ण ज्यादा हूँ ,इस कारण से मेरी याददास्त मजबूत होती है इसी प्रकार से हर बात याद हो जाती है                                                            5 विश्वास कथाओं से सुनता हूँ -बनावटी ,जुटी, घटियाचुटकले  और भ्रम को दूर करने की कोशिश करके मेरा आत्म विश्वास से मैं सोचता हूँ ,मैं महसूस करता हूँ और मेरा सोचना है ,के भाव से इस दुनिया में हमेशा प्रासंगिक आस पास की धटनाओ को चर्चा में भी रखता हूँ ,जिस से आत्मविश्वास दोनो का बना रहता है , हास्य जो शालीनता के है उनको भी महत्व देता हूँ , कई बार जीवन के निजी अनुभव भी सुनाता हूँ ,इस दौरान यह भी ध्यान रखता हूँ की मेरी छवि भी खराब नही हो                  

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

हमारी आधुनिक जीवन शैली =

हमारी आधुनिक जीवन शैली = शारीरिक कर्म का अर्थ है इन्द्रियों के कार्य और इन इन्द्रियों के अवरोध का अर्थ है -सारे शारीरिक कर्मो का अवरोधक ,शरीर के मौन तथा स्थिर या स्वप्न के समय मन कार्यशील [ सक्रिय ] रहता है, परन्तु मन के उपर भी बुद्धि की सकल्पना शक्ति होती है, और बुद्धि के उपर स्वंय आत्मा है .इस आत्मा के अंदर बुद्धि , मन ,तथा इन्द्रियों स्वतः रत है. इस लिए इंद्रिय -विषय, इन्द्रियो से श्रेष्ठ है, और मन इंद्रिय -विषयों से श्रेष्ठ है , यानि आत्मा इंद्रिय-विषयों ,इन्द्रियों मन ,तथा बुध्दी इन सबके उपर है .बुध्दी के द्वारा स्थिति को ढूंढा जाता है ,,जिससे मन को सशक्त बनाया जाता है. बुध्दी पूर्वक अपने मन को प्रेरणा से चलायमान मन को संतुलित चेतन मन बनाया जा सकता है, बुध्दी द्वारा आत्मा और मन को प्रशिक्षित करना चाहिए ..

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

मन का विज्ञान काम के प्रति = मनोविज्ञान

मनोविज्ञान = मन तथा इन्द्रिया काम की शरणागति होती है ,जहाँ बुद्धि ऐसी काम पूर्ण रुचियों की राजधानी बन जाती है ,बुद्धि आत्मा के निकट रहते है जो पड़ोसन कहलाती है, और पड़ोसी जो जाने से उस के प्रभावित हो जाती है.जिससे अहंकार उत्पन्न हो जाता  है.जिससे आदत बनाकर वास्तविक सुख मान जाता है .आगे जिस तरह निरन्तरता ईंधन डालने से अग्नि कभी नही बुझती फिर भौतिक दुनिया मे सभी कार्य कलाप का केंद्र बिंदु काम-सुख [ मैथुन ] है .जिसको काम विषय जीवन की हथकडिया कहा जाता है ...   

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

मेरे मन की, मेरी समस्याओं को किस को बताऊ !


मनोविज्ञान = मन का विज्ञान , मन आत्मा से सटा ठीक एक सिक्के के दो पहलुओं में एक आत्मा और दूसरा मन होता है . मन में विचार आते बुद्धि के रास्ते जो मानव की इन्द्रियों के प्रेरणा से शरीर की वर्तमान स्थिति जो, प्रेरणा ,ध्यान , धारणा,अनुभूति, व्यक्तित्व, व्यवहार, सबंधो का पारंपरिक रूप में अवधारणा जो चेतन से पूर्व अवचेतन या अर्धचेतन के रूप में विधमान रहती है उस को मानसिक कार्यो से व्यावहारिक गतिविधियों को अनुसंधानकर्ताओं का कार्य होता है .जिसमे व्यक्तिगत ,समूहों या असामाजिकता भी हो सकता है को संज्ञात्मक जो मानसिकता जो शारीरिक व्यवहार का कारणों का निवारणार्थ खोज ..खाने-पीने ,ओढ़ने-पहनने ,बातचीत में आधुनिक जीवन शैली से विकृत ,विप्रेरना को सुधारना और नई सूझ उत्पन्न करना मनोविज्ञान के चिकित्सकों का कार्य होता है ,           मेरी समस्याओं को किस को बताए उलझने बनी रहती है तो .आप को कोई परेशानी हो तो इसी पेज पर सम्पर्क करे .. 

भारतीय जीवन विज्ञान दर्शन बीज से शुरू होता है ...... .. गर्भावस्था जिसमें पहले दो प्रकार का समर्थन करता है एक सिक्का के रूप में वर्गीकृत के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं दो कल्याण पहलुओं है कि नकारात्मक पहलू उत्पादन के सकारात्मक पहलू पर बनाने की जरूरत है मानसिक और शारीरिक जीवन देता है कि में सन्तुलन .भारतीय जीवन के लिए जारी रखा अनाज मन की भूमिका को प्रधानता खाने के लिए अनाज होगा ... विचार और मन विज्ञान ज्ञान को विकसित करने के लिए है ......................




शनिवार, 22 दिसंबर 2012

खाने-पिने में मेरा कर्म के प्रभाव

आप का अपना कर्म हमेशा उत्तम होता है .परन्तु सकारात्मक या नकारात्मक प्रभावित आप प्रेरणा से होते है .माना की आप भौतिक-इंद्रिय सुख में भोजन जो करते वो विप्रेरणा या प्रेरणा के कारणों से करते हो करते हो जो आप की बीमारी या स्वास्थ्य को बढ़ता हो ,दुध में दूध ,दलिया ,घी मिलाते तो कोई परिवर्तन नही होता ,परन्तु दूध में इमली ,निम्बू ,दही मिलते ही परिवर्तन हो जाता है और वो लाभदायक की बजाय स्वादिष्ट हो सकता है और अवगुणों को देता है जो बीमारी को बढ़ा सकता है .मेरी जीवन शैली का कारण मेरी प्रेरणा परन्तु में कितना चेतन ,अर्ध चेतन या अवचेतन अवस्था में स्वीकार करता हूँ ,जो मेरे मन में होता वो तन में दीखता मुझे नही दिआ तले अंधेरा की भाति दुसरो को ही दीखता है .

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

आत्म बल

सेक्स में आत्म बल यानि आत्म विश्वास कैसे बढ़ाया                                                                            
 ये ज्ञान-विज्ञान की बाते जो की बाते जो आप के सेक्स जीवन की कमी को पूरा के सकते है .जो विवाह-        सम्बन्ध के अंतर्गत यौन-सुख की छूट दी जाती है .

  1.   बादाम खाने से गर्भ मजबूत होता है बांझपन को दूर करता है बादाम यौन उत्तेजना को बनाने में अवसाद और नकारात्मक इच्छा ,ध्यान और मन को सकारात्मक ऊर्जा वान बनता है ,बादाम में विटामिन ई ,जिंक और सेलेनियम पोषक तत्व होता है .इस में वो पोषक तत्व होते है जो सेक्स हारमोन के उत्पाद में सहायक पाए जाते है ,इस गुणवत्ता का अखरोट फल भी पाया जाता है . स्ट्रॉबेरीज , जामुन.
  2.  निम्बू , संतरा पका फल और खट्टे-मीठे फल में ग्लूकोज की मात्रा तीव्र असरदार, विटामिन सी और एंटीओक्सीडेंट के कारण आत्मविश्वास बढ़ाने से मानव में पर्याप्त शुक्राणु पैदा होते है जिसे नर-नारी में उत्साहित जीवन खेल का मेल-मिलाप का बढ़ता है  यानि बिस्तर कब्बडी में मुकाबला, होने से आत्म विश्वास के पात्र बनता है . .                        
  3. संगीत -काम गति के लिए दिमागी रसायन के लिए संगीत जरूरी होता जिससे जिससे बोरियत मिटा कर एक संतुलित नवीन उत्साह भर देता है .संतुलन का होना जिससे प्रोत्साहित होने और एक शक्तिशाली कामोद्दीपक प्रभाव को बढ़ावा देने का काम करता है . 




रविवार, 7 अक्टूबर 2012

अपनी ऊर्जा शक्तियों को जाने तथा उनका विकास करे

अपने भीतरी छिपी उर्जा शक्तियों को पहचाने और लाभ ले ..भौतिकता और भक्ति .. भौतिकता [ मानव जीवन में दैनिक कार्य जो विकास के लिए , जीवन यापन के लिए ,सामाजिक आर्थिक जीवन जीने के लिए ] और भक्ति [ परिवार पोषण के साथ जीवन मरण से मोक्ष के लिए भगवान से  प्रार्थना ] आसान हो ! [ 1 ] पहली परा शक्ति --यह सब शक्तियों का मूल और आधार है . [ 2 ]  दूसरी, ज्ञान शक्ति . यह मन बुद्धि   चित और अहंकार का रूप धारण कर मनुष्य की क्रिया  का  कारण बन जाती है, इसके द्वारा दूर दृष्टि ,अंतज्ञान और अंतदुष्टि  जैसी सिध्दिया प्राप्त  होती है ,  [ 3 ] तीसरी -इच्छा शक्ति यह शरीर के स्नायु  मण्डल में लहरे उत्पन्न करती है , जिससे  इन्द्रिया सक्रिय होती है और कार्य करने की तरफ संचालित होती है , जब यह शक्ति  सतगुण से जुड़ जाती है तो सुख की ओर शांति की वृद्धि  होती है . [ 4 ] चौथी -क्रिया शक्ति - सात्विक  इच्छा शक्ति इसी के द्वारा कार्य रूप में परिणत फल को पैदा करती है . [ 5 ] पांच वी -कुण्डलिनी शक्ति - यह एक तरह से जीवन शक्ति है . इसके दो रूप है , समष्टि और व्यष्टि ; समष्टि का अर्थ है . पूरी सृष्टि में कई रूपों में विधमान रहना जैसे प्राण प्रकृति का जीवन तत्व .व्यष्टि - रूप में मनुष्य के शरीर के भीतर तेजोमय शक्ति के रूप में रहती है , इस शक्ति दुआरा मन संचालित होता है .इसे परमात्मा की ओर मोड़ दे तो माया के बंधन से मुक्ति मिलती  है। यह साधना से जागृत होती है ,[ 6 ] छट्टी - मात्र का शक्ति - यह अक्षर विज्ञान अक्षर शब्द , वाक्य ज्ञान विधा की शक्ति है .मन्त्रो में शब्दों के शब्दों के प्रभाव कारण यही है ,इसमे बिना कुंडलीनी शक्ति नही जागती है . इस प्रकार अपनी शक्तियों पहचाने और उसमे सुधार करे ...